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Maha Kumbh 2025: नागा साधु और अघोरी साधु में क्या होता है अंतर? किसकी पूजा करते हैं और दोनों के क्या हैं नियम

Sat, 18 Jan 2025 09:51 AM IST
धर्मेंद्र सिंह फीचर डेस्क, अमर उजाला

सार

Maha Kumbh 2025: सनातन धर्म में नागा साधुओं को धर्म का रक्षक माना जाता है, तो वहीं अघोरी साधु अपनी अद्भुत और रहस्यमयी प्रथाओं के लिए प्रसिद्ध है। हालांकि, अघोरी और नागा साधु के तप करने के तरीके, जीवनशैली, ध्यान और आहार अलग-अलग होते हैं।
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नागा साधु और अघोरी साधु में क्या होता है अंतर? - फोटो : Adobe Stock
Maha Kumbh 2025: प्रयागराज में गंगा, युमना और सरस्वती नदी के संगम तट पर दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक मेला महाकुंभ 13 जनवरी 2025 से शुरू हो चुका है, जो 26 फरवरी 2025 तक चलेगा। महाकुंभ में पवित्र संगम में स्नान करने के लिए साधु-संतों के अलावा दुनियाभर से श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। महाकुंभ में इस बार 40 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं के पहुंचने का अनुमान है। अभी तक 7 करोड़ से ज्यादा श्रद्धालु महाकुंभ मेले में पहुंच चुके हैं। महाकुंभ में नागा साधु सबसे अधिक आकर्षण का केंद्र हैं। आज हम आपको अघोरी और नागा साधु में क्या अंतर होता है, इस बारे में बताएंगे। 

सनातन धर्म में नागा साधुओं को धर्म का रक्षक माना जाता है, तो वहीं अघोरी साधु अपनी अद्भुत और रहस्यमयी प्रथाओं के लिए प्रसिद्ध हैं। हालांकि, अघोरी और नागा साधु के तप करने के तरीके, जीवनशैली, ध्यान और आहार अलग-अलग होते हैं। लेकिन दोनों ही शिव की आराधना करते हैं। नागा साधुओं और अघोरी बाबाओं को 12 वर्षों की कठोर तपस्या करनी पड़ती है। अघोरी श्मशान में साधना करते हैं और सालों तक वहीं समय बिताते हैं। 
 
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नागा साधु और अघोरी साधु में क्या होता है अंतर? - फोटो : Adobe Stock
कौन होते हैं नागा साधु?

साधू-संतों में नागा साधुओं की चर्चा जरूर होती है। नागा साधु कपड़े नहीं धारण करते हैं। वह कड़ाके की ठंड में भी नग्न अवस्था में ही रहते हैं। वह शरीर पर धुनी या भस्म लगाकर रहते हैं। नागा संन्यासी पूरा जीवन नग्न अवस्था में ही रहते हैं। वह अपने आपको भगवान का दूत मानते हैं। नागा साधुओं का धर्म की रक्षा करना और शास्त्रों के ज्ञान में निपुण होना मुख्य उद्देश्य है। नागा साधु अखाड़ों से जुड़े होते हैं। वह धर्म का प्रचार करते हैं। नागा साधुओं को कठोर तपस्या और शारीरिक शक्ति के लिए जाना जाता है। नागा साधु अपने शरीर पर हवन की भभूत लगाते हैं।

 
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नागा साधु और अघोरी साधु में क्या होता है अंतर? - फोटो : अमर उजाला
नागा संन्यासी बनने की प्रक्रिया बहुत लंबी और कठिन मानी जाती है। अखाड़ों द्वारा नागा संन्यासी बनाया जाता है। आदिगुरु शंकराचार्य ने आठवीं शताब्दी में सनातन धर्म की रक्षा के लिए अखाड़ों की स्थापना की थी। भारत में मुख्य रूप से कुल 13 अखाड़े हैं। हर अखाडे़ की अपनी मान्यता और पंरपरा होती है और उसी के अनुसार नागा साधु को दीक्षा दी जाती है। कई अखाड़ों में नागा साधुओं को भुट्टो के नाम से भी बुलाया जाता है। अखाड़े में शामिल होने के बाद इनको गुरु सेवा के साथ सभी छोटे काम करने के लिए दिए जाते हैं। 
 

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नागा साधु और अघोरी साधु में क्या होता है अंतर? - फोटो : अमर उजाला
नागा साधुओं का जीवन बेहद ही जटिल होता है। बताया जाता है कि किसी भी इंसान को नागा साधु बनने में 12 साल का लंबा समय लगता है। नागा साधु बनने के बाद वह गांव या शहर की भीड़भाड़ भरी जिंदगी को त्याग देते हैं और रहने के लिए पहाड़ों पर जंगलों में चले जाते हैं। उनका ठिकाना उस जगह पर होता है, जहां कोई भी न आता जाता हो। अखाड़ों में नागा साधु को अनुशासन और संगठित जीवन जीने की शिक्षा दी जाती है। 

नागा साधु बनने की प्रक्रिया में 6 साल बेहद महत्वपूर्ण होता है। इस दौरान वह नागा साधू बनने के लिए जरूरी जानकारी हासिल करते हैं। इस अवधि में वह सिर्फ लंगोट पहनते हैं। वह कुंभ मेले में प्रण लेते हैं जिसके बाद लंगोट को भी त्याग देते हैं और पूरा जीवन कपड़ा धारण नहीं करते हैं। सबसे खास बात यह है कि वह बिस्तर पर नहीं सोते हैं। 

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नागा साधु और अघोरी साधु में क्या होता है अंतर? - फोटो : अमर उजाला
नागा साधु बनने की प्रक्रिया की शुरुआत में सबसे पहले ब्रह्मचर्य की शिक्षा लेनी होती है। इसमें सफलता प्राप्त करने के बाद महापुरुष दीक्षा दी जाती है। इसके बाद यज्ञोपवीत होता है। इस प्रकिया को पूरी करने के बाद वह अपना और अपने परिवार का पिंडदान करते हैं जिसे बिजवान कहा जाता है।

नागा साधुओं को एक दिन में सिर्फ सात घरों से भिक्षा मांगने की इजाजत होती है। अगर उनको इन घरों में भिक्षा नहीं मिलती है, तो उनको भूखा ही रहना पड़ता है। नागा संन्यासी दिन में सिर्फ एक बार ही भोजन करते हैं। नागा साधू हमेशा नग्न अवस्था में रहते हैं और युद्ध कला में पारंगत होते हैं। यह अलग-अलग अखाड़ों में रहते हैं। जुना अखाड़े में सबसे ज्यादा नागा संन्यासी रहते हैं। 

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नागा साधु और अघोरी साधु में क्या होता है अंतर? - फोटो : adobe stock
बताया जाता है कि नागा साधुओं के पास रहस्यमयी शक्तियां होती है। वह कठोर तपस्या करने के बाद इन शक्तियों को हासिल करते हैं। लेकिन कहा जाता है कि वह कभी भी अपनी इन शक्तियों का गलत इस्तेमाल नहीं करते हैं। वह अपनी शक्तियों से लोगों की समस्याओं का समाधान करते हैं।

हिंदू धर्म में किसी भी इंसान की मौत के बाद उसके मृत शरीर को जलाने की मान्यता है जो सदियों से चली आ रही है। लेकिन नागा साधुओं के शव को नहीं जलाया जाता है। नागा संन्यासियों का मृत्यु के बाद भू-समाधि देकर अंतिम संस्कार किया जाता है। नागा साधुओं को सिद्ध योग की मुद्रा में बैठाकर भू-समाधि दी जाती है।

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नागा साधु और अघोरी साधु में क्या होता है अंतर? - फोटो : Adobe Stock
कौन होते हैं अघोरी साधु?

अघोरी साधुओं की उनकी अद्भुत और रहस्यमयी प्रथाओं के लिए जाना जाता है। मानव खोपड़ी अघोरी साधुओं की खास निशानी होती है। अघोरी शब्द का मतलब संस्कृति में उजाले की ओर होता है। माना जाता है कि अघोरी साधु भगवान शिव के अनन्य भक्त होते हैं। वह अपने साथ मानव खोपड़ी रखते हैं, जो उनकी भक्ति का प्रतीक है। बताया जाता है कि वह मानव खोपड़ी में ही खाना खाते हैं। भगवान दत्तात्रेय को अघोरी साधु का गुरु माना जाता है। भगवान दत्तात्रेय को भगवान शिव, विष्णु और ब्रह्मा का अवतार कहा जाता है। 

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नागा साधु और अघोरी साधु में क्या होता है अंतर? - फोटो : Adobe Stock
अघोरी साधु दुनिया की परंपराओं से दूर रहकर जीवन और मृत्यु के रहस्यों को समझते हैं। अघोरी साधु ध्यान में लीन रहते हैं और सिर्फ भगवान शिव की पूजा करते हैं। नागा साधुओं की तरह अघोरी बाबाओं को भी समाज से कुछ ज्यादा मतलब नहीं होता है। नागा साधु भगवान शिव के वैरागी रूप की आराधना करते हैं, तो वहीं अघोरी भगवान शिव के विकराल रूप कलाभैरव की आराधना करते हैं। 

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नागा साधु और अघोरी साधु में क्या होता है अंतर? - फोटो : अमर उजाला
वह श्मशान जैसे स्थान पर रहकर साधना करते हैं, जो उनके वैराग्य को दिखाता है। उनकी साधना में नरमुंड का इस्तेमाल प्रतीकात्मक है। माना जाता है कि यह मृत्यु और जीवन के चक्र का प्रतीक है। अघोरी साधु मांस का सेवन करते हैं। यहां तक कि जानवरों का कच्चा मांस तक भी खाते हैं। आमतौर पर अघोरी काले वस्त्र पहनते हैं या कई निर्वस्त्र भी रहते हैं। अघोरी श्मसान की राख शरीर पर लगाते हैं। अघोरी बाबा जानवरों की खाल या किसी सामान्य कपड़े से शरीर का निचला हिस्सा ढकते हैं। वह काला कपड़ा ही धारण करते हैं। 
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