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मध्य प्रदेश के इस किसान ने ग्लूकोज की खाली बोतलों से की ड्रिप सिस्टम वाली खेती, अब लाखों में हो रही कमाई

Sun, 02 Aug 2020 03:32 PM IST
नवनीत राठौर फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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ग्लूकोज की खाली बोतलों से ड्रिप सिस्टम - फोटो : सोशल मीडिया
कृषि प्रधान देश भारत में किसान को अन्नदाता कहा जाता है। हमारे देश में ज्यादातर लोगों की प्राथमिक आय का स्रोत भी कृषि ही है। लेकिन अधिकांश जगहों पर कम बारिश होने के कारण और नई तकनीक विकसित न होने की वजह से किसानों को उनकी मेहनत का वाजिब फल नहीं मिल पाता है। वहीं कई किसानों को तो संसाधनों की कमी के वजह से नुकसान भी झेलना पड़ जाता है। लेकिन ऐसे में मध्य प्रदेश के एक किसान ने बहुत ही जबरदस्त तरीका निकाल रखा है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Social Media
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, यह किसान मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले का रहने वाला है। झाबुआ एक पहाड़ी आदिवासी क्षेत्र है, जहां खेती करना बहुत ही मुश्किल भरा काम है। बारिश पर आधारित खेती करने के वजह से किसानों को मनमुताबिक परिणाम नहीं मिल पाता था। ऐसे में यहां के एक किसान रमेश बोरिया ने एक नई तरकीब विकसित कर डाली।
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ग्लूकोज की खाली बोतलों से ड्रिप सिस्टम - फोटो : सोशल मीडिया
साल 2009-2010 में उन्होंने राष्ट्रीय कृषि नवाचार परियोजना (NAIP) के कृषि वैज्ञानिकों से संपर्क कर अपने इलाके की समस्या के बारे में बताया। वैज्ञानिकों ने सलाह दिया कि बरसात और सर्दी के समय छोटे से पैच में सब्जी की खेती शुरू करे। क्योंकि ऐसी खेती के लिए उनकी जमीन उतिच थी। लेकिन मानसुन में देरी के कारण पसल खराब होने लगी। इसके बाद उन्होंने वैज्ञानिकों से सलाह लेकर वेस्ट पड़ी ग्लूकोज पानी की बोतलों को ड्रिप सिस्टम की तरह हर पौधों के पास टांग दिया।

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ग्लूकोज की खाली बोतलों से ड्रिप सिस्टम - फोटो : सोशल मीडिया
वेस्ट बोतलों को उन्होंने 20 रुपये किलो के हिसाब से खरीदा। इन बोतलों के ऊपरी हिस्सों को काटकर उन्होंने इनलेट बना दिया और पौधों के पास लटका दिया। इन बोतलों से बूंद-बूंद कर के पानी पौधों पर गिरता है।
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ग्लूकोज की खाली बोतलों से ड्रिप सिस्टम - फोटो : सोशल मीडिया
रमेश के इस तकनीक से ना ही पौधे सूखे और ना ही पानी की भी बर्बादी हुई। मात्र 0.1 हेक्टेयर भूमि से वो करीब 15 हजार रुपये के लाभ कमाने में भी सफल रहे। इतना ही नहीं रमेश को जिला प्रशासन और मध्य प्रदेश सरकार के कृषि मंत्री की सराहना के साथ-साथ प्रमाण पत्र से सम्मानित भी किया गया।
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