कोरोना वायरस
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1963 में द पेरिस रिव्यू को दिए इंटरव्यू में कैथरीन पोर्टर ने बताया था कि, "मुझमें अजीब तरह का बदलाव आ गया था। मुझे फिर से बाहर निकल कर लोगों से घुलने मिलने और जिंदगी बसर करने में बहुत समय लगया था। मैं वाकई बाकी दुनिया से कट सी गई थी।"
इक्कीसवीं सदी की महामारियों जैसे कि 2002 में सार्स, 2012 में मर्स और 2014 में इबोला वायरस के प्रकोप ने भी वीरान शहरों, तबाह हुई जिंदगियों और आर्थिक मुश्किलों को बयां करने के मौके दिए हैं। मार्गरेट ऐटवुड ने 2009 में द ईयर ऑफ द फ्लड नाम के उपन्यास में ऐसी दुनिया की कल्पना की है, जिसमें एक महामारी के बाद इंसान कमोबेश खत्म हो जाते हैं। इसमें एक ऐसी महामारी का वर्णन है जो बिना पानी वाली बाढ़ की तरह आती है। जो हवा में तैरते हुए शहर के शहर जला डालती है।
इस महामारी से जो गिने चुने लोग बचते हैं, वो कितने तन्हा हैं, इसका वर्ण मार्गरेट ऐटवुड ने बखूबी किया है। टोबी नाम की एक मालिन है, जो वीरान से दिखने वाले आसमान की ओर निहारते हुए सोचती है कि, "कोई और तो जरूर बचा होगा। इस धरती पर वो अकेली इंसान तो नही होगी। और लोग भी होंगे। लेकिन, वो दोस्त होंगे या फिर दुश्मन। अगर उसकी मुलाकात किसी से होती है, तो वो क्या माने।" इस उपन्यास की एक और किरदार है रेन नाम की नर्तकी। वो इस वबा से इसलिए बच जाती है कि उसे किसी ग्राहक से मिली बीमारी के चलते क्वारंटीन में रखा गया था। वो घर में बैठे हुए बार-बार अपना नाम लिखती रहती है। रेन कहती है कि, "अगर आप बहुत दिनों तक अकेले रहते हैं, तो आप भूल जाते हैं कि आप असल में हैं कौन।"