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कोरोना वायरसः इस महामारी की भविष्यवाणी करने वाले लोग

Fri, 24 Apr 2020 11:46 AM IST
नवनीत राठौर फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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कोरोना वायरस - फोटो : Pixabay
आज हम जिस दौर से गुजर रहे हैं, उसमें कल का कोई पता नहीं। अभी तो भय ने हमारे जहन पर कब्जा कर रखा है। सामाजिक मेल जोल से दूर हम सभी अपने-अपने घरों में कैद हैं। ताकि नए कोरोना वायरस के संक्रमण की रफ्तार धीमी कर सकें। इस दौरान साहित्य हमारे एकाकीपन को दूर कर रहा है। वो हमें हकीकी दुनिया से दूर ले जा कर राहत देता है। हमारा दोस्त बनता है। मगर, इस दौरान महामारी पर लिखी गई किताबों की मांग भी खूब बढ़ गई है। ऐसे कई उपन्यास हैं, जो महामारी के दौर की वास्तविकता के बेहद करीब हैं। जो पहले की महामारियों की डायरी जैसे हैं। ऐसे उपन्यास हमें बताते हैं कि उस दौर में लोग इस भयावाह आपदा से कैसे बाहर निकले।

ब्रिटिश लेखक डेनियल डेफो ने वर्ष 1722 में किताब लिखी थी-ए जर्नल ऑफ द प्लेग ईयर। इसमें डेनियल ने 1665 में ब्रिटेन की राजधानी लंदन में फैली प्लेग की महामारी के बारे में विस्तार से लिखा है। ये भयावाह चित्रण उस दौर की हर घटना का हिसाब किताब बताने जैसा है। और काफी कुछ हमारे दौर में इस वायरस के प्रकोप से मिलता जुलता है।
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कोरोना वायरस(सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : pixabay
डेनियल डेफो की किताब सितंबर 1664 से शुरू होती है। उस समय अफवाह फैलती है कि ताऊन की वबा ने हॉलैंड पर हमला बोला है। इसके तीन महीने बाद, यानी दिसंबर 1664 में लंदन में पहली संदिग्ध मौत की खबर मिलती है। बसंत के आते आते लंदन की तमाम चर्चों पर लोगों की मौत के नोटिस में भारी इजाफा हो जाता है। जुलाई 1665 के आते-आते लंदन में नए नियम लागू हो जाते हैं। ये नियम ठीक वैसे ही हैं, जो आज करीब चार सौ साल बाद हमारे ऊपर लॉकडाउन के नाम से लगाए गए हैं। तब भी लंदन में सभी सार्वजनिक कार्यक्रम, बार में शराबनोशी, ढाबों पर खाना पीना और सरायों में लोगों के जुटने पर पाबंदी लगा दी गई थी। और अखाडों और खुले स्टेडियम भी बंद कर दिए गए थे।

डेनियल डेफो लिखते हैं, "लंदन वासियों के लिए सबसे घातक बात तो ये थी कि बहुत से लोग लापरवाही से बाज नहीं आ रहे थे। वो गलियों में घूमते थे। सामान खरीदने के लिए भीड लगा लेते थे। जबकि उन्हें घर में ही रहना चाहिए था। हालांकि कई ऐसे लोग भी थे, जो इन नियमों का कडाई से पालन करते हुए घरों में ही रहते थे।"
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
अगस्त का महीना आते-आते, "प्लेग ने बहुत हिंसक रूप धर लिया था। परिवार के परिवार, बस्तियों की बस्तियां इस महामारी ने निगल डाली थीं।" लेकिन, डेनियल डेफो के मुताबिक, "दिसंबर 1665 के आते आते महामारी का प्रकोप धीमा पड़ चुका था। अब हवा साफ और ठंडी थी। जो लोग बीमार पड़े थे, उनमें से कई ठीक हो गए थे। शहर की सेहत सुधरने लगी थी। जब आखिरी गली भी महामारी से मुक्त हो गई, तो लंदन के वासी सडकों पर निकले और खुदा का शुक्र अदा किया।"

चार सौ बरस पहले आई महामारी का माहौल आज से किस कदर मिलता है, ये कहने की बात नहीं। इस वक्त भी लगभग वैसा ही माहौल है। तनाव बढ़ा हुआ है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
डेनियल डेफो की ही तरह अल्बर्ट कामू ने भी महामारी का बखान बडे ही कुदरती अंदाज में किया है। कामू ने अपनी किताब, 'द प्लेग' में अल्जीरिया के ओरां शहर में आई प्लेग की महामारी का वर्णन किया है। उन्नीसवीं सदी में ओरां शहर, प्लेग के कारण वाकई उजड़ गया था। कामू के चित्रण में भी हम आज की झलक देख सकते हैं। पहले तो स्थानीय नेता इस महामारी की आमद को मानने से इनकार करते रहते हैं, जबकि कामू लिखते हैं कि, "शहरों की गलियों में मरे हुए चूहों की भरमार थी।" उनके उपन्यास में एक अखबार का कॉलमनिगार सवाल उठाता है कि, "क्या हमारे शहर के मालिकान को इस बात का एहसास नहीं है कि ये चूहे इंसानों के लिए कितना बड़ा खतरा हैं।"

इस किताब के किस्सागो किरदार डॉक्टर बर्नार्ड, स्वास्थ्य कर्मियों की बहादुरी के बारे में कहते हैं कि,"मुझे पता नहीं है कि मौत किस पल में मेरा इंतजार कर रही है। और आखिर में क्या होगा। अभी तो मैं बस यही जानता हूं कि लोग बीमार हैं और उन्हें इलाज की जरूरत है।" और आखिर में इस महामारी से बचे लोगों के लिए एक सबक भी है कि, "उन्हें अब पता हो गया है कि किसी भी मुश्किल दौर में सबसे अधिक जरूरी चीज होती है इंसान से प्यार करना।"
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कोरोना वायरस - फोटो : सोशल मीडिया
1918 में स्पेनिश फ्लू की महामारी ने भी दुनिया का रंग रूप बदल डाला था। इस महामारी के चलते दुनिया भर में कम से कम पांच करोड़ लोग मारे गए थे। जबकि इससे ठीक पहले हुए पहले विश्व युद्ध में एक करोड़ लोगों ने जान गंवाई थी। मगर, युद्ध की नाटकीय घटनाओं ने इस महामारी के प्रभाव को छुपा दिया था।

पहले विश्व युद्ध पर तो अनगिनत उपन्यास लिखे गए। पर स्पेनिश फ्लू की महामारी पर भी ढेर सारी किताबें लिखी गई थी। आज लॉकडाउन की वजह से लोग घरों में रह रहे हैं और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कर रहे हैं। 1939 में ब्रिटिश लेखिका कैथरीन एन पोर्टर ने अपने उपन्यास 'पेल हॉर्स, पेल राइडर' में स्पेनिश फ्लू की महामारी का वर्णन किया है। पोर्टर के उपन्यास की किरदार मिरांडा जब बीमार पडती हैं, तो मिरांडा का दोस्त एडम उन्हें बताता है कि, "ये बेहद बुरा दौर है। सभी थिएटर, दुकानें और रेस्तरां बंद हैं। गलियों में से दिन भर जनाजे निकलते रहते हैं। रात भर एंबुलेंस दौड़ती रहती हैं।"

कैथरीन पोर्टर, मिरांडा के, बुखार और दवाओं के जरिए हफ्तों चली बीमारी के बारे में बताती हैं। जब वो ठीक होती हैं और बाहर निकलती हैं तो देखती हैं कि दुनिया युद्ध और फ्लू के चलते किस कदर बदल चुकी है। खुद कैथरीन भी स्पेनिश फ्लू की वजह से मरते मरते बची थीं।
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कोरोना वायरस - फोटो : फाइल फोटो
1963 में द पेरिस रिव्यू को दिए इंटरव्यू में कैथरीन पोर्टर ने बताया था कि, "मुझमें अजीब तरह का बदलाव आ गया था। मुझे फिर से बाहर निकल कर लोगों से घुलने मिलने और जिंदगी बसर करने में बहुत समय लगया था। मैं वाकई बाकी दुनिया से कट सी गई थी।"

इक्कीसवीं सदी की महामारियों जैसे कि 2002 में सार्स, 2012 में मर्स और 2014 में इबोला वायरस के प्रकोप ने भी वीरान शहरों, तबाह हुई जिंदगियों और आर्थिक मुश्किलों को बयां करने के मौके दिए हैं। मार्गरेट ऐटवुड ने 2009 में द ईयर ऑफ द फ्लड नाम के उपन्यास में ऐसी दुनिया की कल्पना की है, जिसमें एक महामारी के बाद इंसान कमोबेश खत्म हो जाते हैं। इसमें एक ऐसी महामारी का वर्णन है जो बिना पानी वाली बाढ़ की तरह आती है। जो हवा में तैरते हुए शहर के शहर जला डालती है।

इस महामारी से जो गिने चुने लोग बचते हैं, वो कितने तन्हा हैं, इसका वर्ण मार्गरेट ऐटवुड ने बखूबी किया है। टोबी नाम की एक मालिन है, जो वीरान से दिखने वाले आसमान की ओर निहारते हुए सोचती है कि, "कोई और तो जरूर बचा होगा। इस धरती पर वो अकेली इंसान तो नही होगी। और लोग भी होंगे। लेकिन, वो दोस्त होंगे या फिर दुश्मन। अगर उसकी मुलाकात किसी से होती है, तो वो क्या माने।" इस उपन्यास की एक और किरदार है रेन नाम की नर्तकी। वो इस वबा से इसलिए बच जाती है कि उसे किसी ग्राहक से मिली बीमारी के चलते क्वारंटीन में रखा गया था। वो घर में बैठे हुए बार-बार अपना नाम लिखती रहती है। रेन कहती है कि, "अगर आप बहुत दिनों तक अकेले रहते हैं, तो आप भूल जाते हैं कि आप असल में हैं कौन।"
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कोरोना वायरस - फोटो : सोशल मीडिया
ऐटवुड का उपन्यास फ्लैशबैक में भी जाता है। इस दौरान वो बताती है कि किस तरह कुदरती और इंसानी दुनिया का संतुलन बिगड़ा। क्योंकि सत्ताधारी कंपनियों ने बायो इंजीनियरिंग के जरिए कुदरत से छेड़खानी की थी। और किस तरह टोबी जैसी पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विरोध किया था। यानी मार्गरेट ऐटवुड ने अपने उपन्यास को हकीकत की बहुत ठोस बुनियाद पर लिखा था।

किसी भी महामारी पर आधारित किस्से इसलिए आकर्षित करते हैं क्योंकि इंसान आपस मे मिल कर इनका सामना करते हैं। दुश्मन ऐसा होता है, जो इंसान नहीं होता। तब दुनिया में अच्छे या बुरे का फर्क मिट जाता है। हर किरदार के पास बचने का बराबर का मौका होता है। ये एक तरह से समाजवादी दुनिया हो जाती है।

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कोरोना वायरस - फोटो : Pixabay
चीनी मूल की अमरीकी लेखिका लिंग मा ने 2018 में 'सेवरेंस' नाम से उपन्यास लिखा था। इसमें दूसरे देशों से आकर अमेरिका में बसे लोगों की कहानी भी शामिल थी। जिसमें कैडेंस चेन नाम की युवती, किस्से को आगे बढ़ाती है। वो बाइबिल छापने वाली एक फर्म में नौकरी करती है। 2011 में न्यूयॉर्क पर हमला करने वाली काल्पनिक 'शेन फीवर' नाम की महामारी में केवल नौ लोग बच पाते हैं। इनमें से एक कैडेंस भी शामिल होती है। लिंग मा लिखती हैं कि, "महामारी के बाद शहर का बुनियादी ढांचा तहस नहस हो चुका है। इंटरनेट बर्बाद हो गया है। बिजली की ग्रिड भी बंद हो गई है।"

इसके बाद कैडेंस चेन और बचे हुए बाकी के लोग शिकागो के उपनगरीय इलाके के एक मॉल की ओर रवाना होते हैं। वो वहां जा कर बसने का इरादा रखते हैं। ये लोग जिस रास्ते से गुजरते हैं वो बीमारी और बुखार का शिकार नजर आता है। मरते हुए लोग पुरानी आदतों के ही शिकार हैं। कैडेंस और उसके साथी सोचते हैं कि वो वाकई इस महामारी के प्रति इम्यून हैं या फिर बस दैवीय कृपा से बच गए हैं।

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कोरोना वायरस - फोटो : Pixabay
कैडेंस को बाद में पता चलता है कि उसके बचने का एक ही तरीका है कि वो अपने ग्रुप के अगुवा बॉब के बनाए धार्मिक नियों का पालन करते। बॉब एक पुराना आईटी प्रोफेशनल है। बाद में कैडेंस, बॉब से बगावत कर देती है।

लिंग मा ने अपने उपन्यास में जैसे हालात की कल्पना की है, वैसे फिलहाल तो हमारे सामने नहीं हैं। लेकिन, लिंग मा ने उस दुनिया का भी तसव्वुर किया है, जब महामारी तबाही मचा कर चली जाती है। फिर समाज के निर्माण की चुनौती खड़ी होती है। एक संस्कृति के विकास का प्रश्न उठता है। जो लोग बचे हैं उनके बीच सत्ता किसके हाथ में होगी? किस धार्मिक परंपरा को मानना है, ये कौन तय करेगा? कैसे लोगों की निजता के अधिकार बचेंगे?

इसी तरह एमिली सेंट जॉन मंडेल के 2014 में आए उपन्यास स्टेशन इलेवन की कहानी है। एक बेहद संक्रामक बीमारी जॉर्जिया नाम के गणराज्य से उठती है। ठीक वैसे ही जैसे कोई न्यूट्रॉन बम फट गया हो। और इस महामारी से दुनिया की 99 फीसद आबादी खत्म हो जाती है। इस महामारी की शुरुआत उस समय होती है, जब शेक्सपीयर के नाटक किंग लीयर का एक किरदार निभा रहे व्यक्ति को मंच पर ही दौरा पड़ता है। इसके बाद की कहानी, बीस साल बाद की है, जब उस व्यक्ति की पत्नी स्टेशन इलेवन नाम की जगह पर नमूदार होती है। स्टेशन इलेवन के अन्य बचे हुए किरदार, खाली पड़े शॉपिंग मॉल्स और छोटे शहरों में नाटक का मंचन करते हैं। गा बजा कर लोगों का मनोरंजन करते हैं।
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कोरोना वायरस - फोटो : सोशल मीडिया
कई अर्थों में स्टेशन इलेवन की कहानी, चौदहवीं सदी के ब्रिटिश कवि चौसर की मशहूर या बदनाम कहें, कैंटरबरी टेल्स से काफी मिलती जुलती है। चौसर की लिखी ये आखिरी रचना थी, जिसमें चौदहवीं सदी में यूरोप को बर्बाद करने वाली ब्लैक डेथ या प्लेग की बुनियाद पर लिखा गया था।
एमिली सेंट जॉन मंडेल सवाल उठाती हैं कि कौन तय करेगा कि कला क्या है? क्या सेलेब्रिटी का बर्ताव संस्कृति है? जब कोई वायरस, मानवता पर आक्रमण करता है, तो फिर नई संस्कृति का निर्माण कैसे होगा? पहले की कला और संस्कृति में क्या बदलाव आएंगे? इसमें कोई दो राय नहीं कि हमारे मौजूदा हालात पर भी उपन्यासों की भूमिका तैयार हो रही होगी। आने वाले समय में किस्सागो किस तरह से इस महामारी का वर्णन करेंगे? वो इंसानों के बीच की सामुदायिक भावना को कैसे व्यक्त करेंगे? हमारे बीच के अनगिनत बहादुर लोगों के बारे में क्या लिखेंगे?
ये वो सवाल हैं, जो तब उठेंगे जब हम और पढेंगे। साथ ही साथ इस महामारी के बाद उभरने वाली नई दुनिया के लिए खुद को तैयार करेंगे।
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