फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

एक मिलीमीटर का वो कीड़ा, जिसने एक देश की अर्थव्यवस्था बचा ली

Mon, 11 Jan 2021 04:45 PM IST
नवनीत राठौर फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
विज्ञापन
1 of 10
ततैया - फोटो : सोशल मीडिया
रासायनिक कीटनाशकों की खोज से पहले फसलों में लगने वाले कीड़ों को खत्म करने के लिए किसान छोटे शिकारी जीवों पर निर्भर रहे हैं। वही प्रथा अब नए रूप में सामने आई है। दक्षिण पूर्व एशिया में जैव विविधता से समृद्ध जंगलों में लाखों किसान कसावा की खेती पर निर्भर हैं। इस नकदी फसल की खेती एक-दो हेक्टेयर जमीन वाले छोटे किसान भी करते हैं और हजारों हेक्टेयर वाले बड़े किसान भी।

कसावा के स्टार्च का इस्तेमाल प्लास्टिक और गोंद बनाने में होता है। कसावा को जब पहली बार दक्षिण अमेरिका से लाया गया तब यहां के किसान बिना किसी कीटनाशक की मदद के इसकी खेती करते थे। 2008 से इसमें मिलीबग कीड़े लगने लगे और फसल बर्बाद होने लगी। घाटे की भरपाई के लिए किसानों ने जंगल की जमीन में घुसपैठ करनी शुरू की ताकि थोड़ी ज्यादा फसल ले सकें।
Trending Videos
विज्ञापन

2 of 10
कसावा की खेती (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : सोशल मीडिया
बीजिंग के पौध संरक्षण संस्थान में जैव नियंत्रण विशेषज्ञ क्रिस वाइकहायस का कहना है कि कुछ क्षेत्रों में जंगल की कटाई बहुत तेज हो गई। कंबोडिया में जंगल कटाई की दर सबसे ज्यादा है। मिलीबग कीड़ों ने कसावा किसानों की रोजी-रोटी के साथ-साथ इस क्षेत्र के देशों की अर्थव्यवस्था पर भी असर डाला। स्टार्च के वैकल्पिक स्रोतों, जैसे मक्का और आलू की कीमत बढ़ गई। थाईलैंड दुनिया में कसावा स्टार्च का नंबर एक निर्यातक है। वहां इसके दाम तीन गुणा बढ़ गए।

वाइकहाइस कहते हैं, "जब कोई कीड़ा पैदावार 60 से 80 फीसदी कम कर दे तो आपको बड़ा झटका लगेगा।" समाधान के तौर पर दक्षिण अमेरिका में मिलीबग के प्राकृतिक शत्रु, एक मिलीमीटर लंबे परजीवी ततैया (एनागायरस लोपेजी) की खोज करनी थी। यह छोटा ततैया कसावा मिलीबग पर ही अंडे देता है। 2009 के आखिर में इस ततैये को थाईलैंड के कसावा खेतों में छोड़ा गया और आते ही इसने काम शुरू कर दिया। इस बात की विस्तृत जानकारी नहीं है कि ततैये कितनी तेजी से मिलीबग की आबादी को साफ कर देते हैं। 2010 में पूरे थाईलैंड में हवाई जहाजों से लाखों ततैये छोड़े गए। जल्द ही उनका असर दिखने लगा।
विज्ञापन

3 of 10
ततैया - फोटो : सोशल मीडिया
एक मिलीमीटर के शिकारी
1980 के दशक में यही ततैये पश्चिम अफ्रीका में छोड़े गए थे। उन्होंने तुरंत ही मिलीबग की तादाद 80 से 90 फीसदी तक घटा दी थी। तीन साल से भी कम समय में ये ततैये दक्षिण-पश्चिमी नाइजीरिया के दो लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैल गए। वहां के कसावा खेतों में ये आसानी से मिल जाते हैं। इस तरह के हस्तक्षेप को जैव नियंत्रण कहा जाता है। आप एक प्राकृतिक शिकारी को ढूंढ़ते हैं और उसे कीड़ों को खाने के लिए खेतों में छोड़ देते हैं। इससे एशिया-प्रशांत क्षेत्र के 26 देशों के किसानों को सालाना 14.6 अरब डॉलर से लेकर 19.5 अरब डॉलर तक का फायदा हुआ। वाइकहाइस कहते हैं, "एक मिलीमीटर के ततैये ने वैश्विक स्टार्च बाजार की बड़ी समस्या सुलझा दी।"

किसानों को सही कीट होने के फायदे सदियों से पता हैं। कनाडा के ओंटारियो में वाइनलैंड रिसर्च एंड इनोवेशन सेंटर की वैज्ञानिक रोज ब्यूटेन्हस का कहना है कि जैव नियंत्रण हजारों साल से हो रहा है। इसे नया समझना मजाक है। सवाल है कि यदि जैव नियंत्रण इतना कारगर हो सकता है तो हानिकारक कीड़ों को खत्म करने में इसका इस्तेमाल क्यों नहीं होता? अगर यह काम न करे तो क्या होगा? और शोधकर्ता इसमें बदलाव पर जोर क्यों दे रहे हैं?

4 of 10
केन टोड (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Pixabay
समाधान या समस्या?
पूर्व-कोलंबियाई मेसो-अमरीकी लोग केन टोड (दादुर या बड़े मेढक) को जीवन और मृत्यु के बीच का समझते थे। ये टोड एक जहर बनाते थे जो मतिभ्रम उत्पन्न करता था। मेसो-अमरीकी पुजारी इसका इस्तेमाल मृत पुरखों से संवाद करने में इस्तेमाल करते थे। माया सभ्यता के लोग सांप और चिड़ियों को पूजते थे जो मेसो-अमरीकी कला में भी दिखता है। माया और अन्य देसी समुदायों ने केन टोड को भी अपने शिल्प में जगह दी है। पानी और जमीन दोनों पर रहने वाले और बारिश में टर्र-टर्र करने वाले टोड फसलों की सेहत के लिए जरूरी थे।

अंडे से टैडपोल और टोडलेट्स का विकास बारिश का मौसम शुरू होने का संकेत देता था। पानी से उनका बाहर आना मानो पाताल से बाहर आने जैसा था। केन टोड फसलों में लगने वाले कीड़ों को दूर रखते थे। मक्के के खेतों और अनाज के भंडारों में वे कीट-पतंगों और छोटे कीड़ों को चट कर जाते। केन टोड का जहर शिकारी दुश्मनों से उनकी रक्षा करता है। वह जहर इतना तेज होता है कि लापरवाही बरतने पर इंसान की भी जान ले सकता है। मेसो-अमेरिका के स्वदेशी लोग कुदरत के इस दोहरेपन को समझते थे। वह यह भी जानते थे कि कुदरत से खिलवाड़ के गंभीर नतीजे हो सकते हैं।
विज्ञापन

5 of 10
केन टोड (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : सोशल मीडिया
ऑस्ट्रेलिया केन टोड से नफरत करता है। वहां 1935 में जैव नियंत्रण के लिए अमेरिका से इन्हें मंगाया गया था। उत्तर-पूर्वी प्रांतों के गन्ना खेतों में वे खूब फले-फूले। उन खेतों में टोड के मनपसंद कीड़ों (केन बीटल और अन्य ऑस्ट्रेलियाई कीड़े) की बहुतायत थी और टोड का शिकार करने वाले जीव कम थे। इससे उनकी संख्या का विस्फोट हो गया। 2007 में अनुमान लगाया गया कि केन टोड ऑस्ट्रेलिया के 12 लाख वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र में छाए हुए हैं और उनकी तादाद 1.5 अरब हो गई है। जलवायु परिवर्तन से यह तादाद और बढ़ सकती है। नतीजा विनाशकारी था। देसी मेढकों का शिकार करने वाले जीव, जैसे कुओल और बड़ी छिपकलियां केन टोड के जहर से मरने लगे। ऑस्ट्रेलिया सरकार और स्थानीय लोग हर साल लाखों टोड मारते हैं।
विज्ञापन

6 of 10
केन टोड (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : सोशल मीडिया
गलती कहां हुई?
वाइकहाइस कहते हैं, "टोड को उस समय के वैज्ञानिक सुझावों के विपरीत छोड़ा गया था। ऐसा बिल्कुल नहीं करना चाहिए था। आधुनिक जैव नियंत्रण में ऐसा करना नामुमकिन है। आप विविधभक्षियों, हड्डी वाले शिकारियों को बिल्कुल नहीं छोड़ सकते। इसकी सख्त मनाही है।" यह अकेला मामला नहीं है। ऐसे कम से कम 10 उदाहरण हैं। 

दूसरे विश्वयुद्ध में जापान और उसके सहायक देशों ने प्रशांत क्षेत्र के द्वीपों में अपने सैनिकों को मलेरिया से बचाने के लिए मच्छरों के लार्वा खाने वाली मछलियां छोड़ी थीं। ये छोटी मछलियां अब उस क्षेत्र में आक्रामक प्रजाति है। ये स्थानीय प्रजातियों को खत्म कर रही हैं। एफिड कीड़ों को नियंत्रित करने के लिए यूरोप में छोड़े गए एशियन लेडीबग (गुबरैला) ने भी यही किया।

इस तरह की नाकामियों के बाद 20वीं सदी के पूर्वार्ध में जैव नियंत्रण की जगह रासायनिक नियंत्रण (कीटनाशक) के इस्तेमाल ने जोर पकड़ा। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो जैव नियंत्रण के विवाद निराधार हैं। इसकी कामयाबी की कहानियां नाकामियों की कहानियों से कम से कम 25 गुणा अधिक हैं। कुछ शोधकर्ता इस धारणा को बदलने का प्रयास कर रहे हैं।
विज्ञापन

7 of 10
रासायनिक कीटनाशक - फोटो : सोशल मीडिया
कीटनाशक खत्म हो जाएंगे?
रासायनिक कीटनाशकों ने 1930, 1940 और 1950 के दशकों में कई समस्याएं हल कीं। किसानों को ज्यादा मेहनत करने की जरूरत नहीं थी। उनको बस स्प्रे करना था और कीड़े मर जाते थे। इसके साथ मसला यह है कि कीड़े किसी खास रसायन से प्रतिरोधी संतानें पैदा कर लेते हैं। एक रसायन जो किसी कीड़े पर काम करता है, मुमकिन है कि वही रसायन कीड़े की अगली पीढ़ी पर काम न करे। कीटनाशक उत्पादकों को अपने उत्पाद में नियमित सुधार की जरूरत होती है।

किसानों के लिए कीटनाशक घटते जा रहे हैं। 2018 में यूरोपीय संघ ने निओ-निकोटिनॉयड कहलाने वाले तीन कीटनाशकों को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया। निकोटिन जैसी रासायनिक संरचना वाले ये कीटनाशक जमीन में बोये गए बीजों को कीड़ों से बचाते हैं। लेकिन पौधे बढ़ने पर ये कीटनाशक उसके फूल और परागकणों तक पहुंच जाते हैं। परागण करने वाले जीव भी कीटनाशकों के संपर्क में आ जाते हैं। इस पाबंदी के आलोचकों का कहना है कि किसान अब पौधों पर स्प्रे किए जाने वाले कीटनाशक अपनाएंगे। परागणकों पर उनका भी उतना ही बुरा असर पड़ेगा। साथ ही वे किसानों के लिए महंगे भी होंगे।

कीटनाशकों के साथ कई नकारात्मक सामाजिक और पारिस्थितिकी कारक जुड़े हुए हैं। कीटनाशकों के अवशेष कोस्टारिका के बादल वन और ऑस्ट्रेलिया के ग्रेट बैरियर रीफ में भी मिले हैं। कीटनाशक गलत जगह पड़ जाएं तो कभी-कभी जिंदगी छीन लेते हैं। खेती की जमीन के पास वातावरण में घुल-मिलकर वे पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचाते हैं। वाइकहाइस जैसे वैज्ञानिकों को जैव नियंत्रण की अच्छी बात यही लगती है कि इसे लक्षित किया जा सकता है। ब्रिटेन में जैव नियंत्रक तैयार करने वाली कंपनी बायोलीन एग्रोसाइंसेज की सीनियर टेक्निकल हेड कैरोलीन रीड इससे सहमत हैं। विशिष्ट जैव नियंत्रक रासायनिक कीटनाशकों की तादाद घटा सकते हैं। वे सुरक्षित हैं और यूरोप में उनको बढ़ावा दिया जा रहा है। वे मुख्यधारा की खेती का हिस्सा बन रहे हैं।

8 of 10
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
जैविक नियंत्रण
मोटे तौर पर तीन तरह के जैव नियंत्रक हैं- शिकारी, परजीवी भक्षक और पैथोजेन्स (रोगजनक कीट)। केन टोड शिकारी जैव नियंत्रक का उदाहरण है। वे झींगुर और गुबरैले को खा सकते हैं। लेकिन बदकिस्मती से वे सिर्फ झींगुरों को ही नहीं खाते। ऑस्ट्रेलिया में उन्होंने दूसरे देसी कीड़ों को भी खाना शुरू कर दिया जो पौधों के लिए नुकसानदेह नहीं हैं। परजीवी भक्षकों में उन ततैयों या मक्खियों की प्रजातियां आती हैं जो अपने अंडे दूसरे कीड़ों के अंदर डाल देते हैं। इनके लार्वा तैयार होते हैं तो मेजबान कीड़े का पेट फट जाता है और वे मर जाते हैं।

पैथोजेन्स अपने मेजबान को मार देते हैं। वे फंगी (कवक), वायरस या बैक्टीरिया हो सकते हैं। वे बहुत ही खास किस्म के कीड़ों को निशाना बनाते हैं, इसलिए ये आधुनिक जैव नियंत्रण शोध में लोकप्रिय विकल्प हैं। पैथोजेन्स के दूसरे हानिरहित प्रजातियों पर हमला करने का जोखिम बहुत कम है। मगर वायरस समय-समय पर एक प्रजातियों में दूसरी प्रजातियों में जाते रहे हैं। सफल जैव नियंत्रकों में प्रजनन दर तेज होनी चाहिए ताकि लक्षित कीड़ों का पता चलते ही वे अपनी तादाद तेजी से बढ़ा सकें। उनको लक्ष्य की पहचान होनी चाहिए और कुशलता से उनका शिकार करने में सक्षम होना चाहिए। व्यवहार में कोई जैव नियंत्रक संपूर्ण नहीं है। इसलिए शोधकर्ताओं को जोखिम का संतुलन बनाना पड़ता है।

9 of 10
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
कैसे करें इस्तेमाल?
किसी फसल पर जैव नियंत्रकों के इस्तेमाल के तीन तरीके हैं- परंपरागत, संरक्षण और संवर्धित नजरिया। केन टोड परंपरागत जैव नियंत्रक के उदाहरण हैं (हालांकि खराब उदाहरण) जिसमें परिवेश में एक नई प्रजाति को पेश किया जाता है। जैव नियंत्रण का परंपरागत उपाय आक्रामक प्रजातियों के नियंत्रण के काम आता है। इसमें उस कीड़े की उत्पत्ति के क्षेत्र में जाकर उसके प्राकृतिक शत्रुओं की पहचान की जाती है और उन जीवों का चुनाव किया जाता है जो उस कीड़े को नियंत्रित करने में सबसे अधिक प्रभावी हैं।

वाइकहाइस कहते हैं, "हम ऐसे जीव को पेश नहीं करना चाहते जो अन्य जीवों के लिए नुकसानदेह हों। हम एक प्रभावी जैव नियंत्रक को चुनते हैं जो अपने शिकार पर ही वार करे।" वैकल्पिक तौर पर, संरक्षण वादी नजरिये में उसी क्षेत्र के शिकारी जीवों को बढ़ावा दिया जाता है। बंदगोभी की खेती के एक अध्ययन में पाया गया कि जहां खेत के चारों ओर चरागाह थे वहां बंदगोभी खाने वाले कीड़े कम थे। शोधकर्ताओं के मुताबिक इसकी वजह उस परिवेश में मौजूद परजीवी ततैये थे।

कुछ अन्य मामलों में चरागाह होने से एफिड और पिस्सू गुबरैले बढ़ गए। इसलिए यह जरूरी नहीं कि घास के मैदान बढ़ा देने से कीड़ों की तादाद घट जाएगी। इस तरह से उन कीड़ों को ही नियंत्रित किया जा सकता है जो स्थानीय परिवेश वाले हैं। परंपरागत जैव नियंत्रकों की तरह, कई तरह के कीड़ों की प्रजातियों को पर्यावरण में इंसान ही लेकर आया है। जब एक देश दूसरे देशों से बीज और फसल मंगाता है तो उसके साथ कीड़ों का चले आना आम बात है। नये परिवेश में प्राकृतिक शिकारियों की गैर मौजूदगी में वे तेजी से बढ़ते हैं।

संवर्धित तरीके में किसी रोगजनक या परजीवी को खेतों में एक खास समय पर छोड़ा जाता है- जब कीड़े प्रजनन शुरू करते हैं या अंडे देते हैं या फिर कीड़ों के आने से पहले, ताकि उनकी तादाद बढ़ने से पहले ही खतरे को खत्म कर दिया जाए। इसका फायदा यह है कि आप कीड़ों से निपटने के तरीके में बहुत विशिष्ट हो सकते हैं। वाइकहाइस कहते हैं, "संवर्धित नियंत्रण यूरोप के ग्रीनहाउस सेक्टर में बहुत लोकप्रिय है। कुछ क्षेत्रों में कीटनाशकों का प्रयोग शून्य है।"

ग्रीनहाउस में दशकों से जैव नियंत्रण हो रहा है, तब भी जब रासायनिक कीटनाशकों का जोर था। बंद घेरे में यह काम ज्यादा आसान है। शिकारी जैव नियंत्रकों के दूर जाने का खतरा नहीं होता। यह भी एक तथ्य है कि ग्रीनहाउस में पैदा होने वाली फसलों का मूल्य अधिक होता है।
विज्ञापन

10 of 10
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
जैव नियंत्रण का विस्तार
हाल के वर्षों में जैव नियंत्रण फूलों की खेती, अंगूर की खेती और स्ट्रॉबेरी की खेती में भी फैल गई है। ब्यूटेन्हस कहती हैं, "कनाडा में हमने 2017/18 में सर्वेक्षण किया तो पता चला कि 92 फीसदी फूल उत्पादक मुख्य कीट नियंत्रण रणनीति के तौर पर जैव नियंत्रकों का इस्तेमाल करते हैं। यह सफलता की अद्भुत कहानी है।"

ब्यूटेन्हस और रीड को मालूम है कि जब अनाज उगाने वाले किसान बड़े खेतों में जैव नियंत्रकों का इस्तेमाल करने लगेंगे तब हालात उनके पक्ष में हो जाएंगे। रीड के लिए गेहूं और जौ के खेतों में इसका इस्तेमाल अहम है। इसी तरह ब्यूटेन्हस का कहना है कि कोलंबिया, इक्वेडोर और केन्या जैसे देशों को इसके लिए राजी करना बड़ी कामयाबी होगी। "यह होने जा रहा है। रसायनों का इस्तेमाल करना है कि दीर्घकालिक स्थायी रणनीति नहीं है।"
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें