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भारत का वो नवाब, जो प्रधानमंत्री बनने के लिए पहुंच गया पाकिस्तान

Mon, 23 Nov 2020 09:15 AM IST
नवनीत राठौर फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सर हमीदुल्लाह खान - फोटो : Wikipedia
1956 में जुलाई का महीना पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में एक खास महत्व रखता है। 'पाकिस्तान क्रॉनिकल'(संपादन अकील अब्बास जाफरी) में 31 जुलाई की तारीख के संबंध में लिखा है कि उस दिन प्रधानमंत्री चौधरी मोहम्मद अली को उनके पद से हटाने के लिए साजिशें जोरों पर थीं और वो राजनीति में अकेले पड़ चुके थे। प्रधानमंत्री जिस तरह की समस्याओं में घिरे चुके थे, वो अचानक नहीं हुआ था बल्कि उससे पहले 13 जुलाई को एक ऐसी घटना घटी थी, जिसकी वजह से प्रशासन पर सरकार का नियंत्रण खत्म हो गया था।

उस दिन कराची के कमिश्नर और गृह सचिव ने खुफिया पुलिस के कार्यालय पर छापा मार कर मंत्रियों और सरकार के उच्च अधिकारीयों के टेलीफोन रिकॉर्ड करने वाले उपकरण कब्जे में ले लिए थे। इस घटना ने राजनीतिक स्थिरता को बुरी तरह प्रभावित किया। साथ ही देश के राजनीतिक नेतृत्व और ब्यूरोक्रेसी को सीढ़ी बना कर सत्ता में जगह बनाने वाले वर्ग के बीच पहले से मौजूद दरार को और बढ़ा दिया।
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इस्कंदर मिर्जा - फोटो : Wikipedia
सत्ता में बने रहने के लिए नई-नई तरकीबें आजमाई जाने लगीं, उनमें से एक तरकीब चुनाव को स्थगित करना भी था। जिसकी सबसे अधिक जरूरत पूर्व गृहमंत्री और तत्कालीन राष्ट्रपति मेजर जनरल (रिटायर्ड) इस्कंदर मिर्जा को थी। इस्कंदर मिर्जा ने वन यूनिट की वजह से बढ़ती बेचैनी की भावना को अपने मकसद के लिए इस्तेमाल करने का फैसला किया था।

इस्कंदर मिर्जा कुछ समय में चौधरी मोहम्मद अली के बाद उनके उत्तराधिकारी हुसैन शहीद सुहरावर्दी को भी घर भेजने में कामयाब हो चुके थे। अब उनके सामने समस्या ये थी कि चुनाव के अलावा प्रधानमंत्री फिरोज खान से कैसे बचा जाए। इस मकसद के लिए सबसे पहले उन्होंने पूर्व रियासत कलात के शासक मीर अहमद यार खान को विश्वास में लिया।

"मैंने भोपाल के नवाब को बुला लिया है, वो प्रधानमन्त्री बन जाएंगे, मैं तो राष्ट्रपति हूं ही, उसके बाद सब ठीक हो जाएगा।"

मेजर जनरल (रिटायर्ड) इस्कंदर मिर्जा ने खान ऑफ कलात मीर अहमद यार खान के कान में आहिस्ता से कहा था।

"बस, तुम कोई ऐसा उपाय करो कि ये सब काम बिना किसी रुकावट के हो जाए।"

और अगली ही सुबह नवाब ऑफ भोपाल सर हमीदुल्लाह खान पाकिस्तान की राजधानी कराची में थे।

इस तरह इस मंसूबे के पूरा होने में इतनी ही देर बाकी रह गई, जिसके लिए गालिब ने कहा था- "दो चार हाथ जबकि लब ए बाम रह गया।"
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हुसैन शहीद सुहरावर्दी - फोटो : Wikipedia
इस्कंदर मिर्जा की योजना की शुरूआत
खान ऑफ कलात की किताब 'इनसाइड बलूचिस्तान' के अनुसार उस जमाने में पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की बहन फातिमा जिन्ना, मुस्लिम लीग के अध्यक्ष खान अब्दुल कय्यूम खान और एक साल पहले तक देश के प्रधानमंत्री और पूर्वी पाकिस्तान के कद्दावर नेता हुसैन शहीद सहरवर्दी विपक्ष का नेतृत्व कर रहे थे। जनता आने वाले चुनाव का इंतजार कर रही थी और राष्ट्रपति इस्कंदर मिर्जा खतरा महसूस कर रहे थे कि इन बड़े नेताओं के मुकाबले में उनकी दाल आसानी से गलने वाली नहीं है। इसी खतरे को भांपते हुए इस्कंदर मिर्जा ने एक योजना बनाई, जिसमें एक किरदार नवाब ऑफ भोपाल को और एक खान ऑफ कलात को अदा करना था।

ये 1957 की गर्मियों की बात है, जब बलूचिस्तान के रेगिस्तान तांबे की तरह तप रहे थे। बिल्कुल इसी तरह बलूचिस्तान की पूर्व रियासत कलात की जनता, प्रमुखों और बुजुर्गों के दिलों में बेचैनी की लहरें करवटें ले रही थीं। वो खतरा महसूस कर रहे थे कि आने वाले दिनों में कलात की स्थानीय परंपरा और बलोच संस्कृति की सिर्फ यादें रह जाएंगी। जिसकी सुरक्षा का लिखित आश्वासन खुद कायद-ए-आजम ने इस क्षेत्र की जनता को दिया था। इस खतरे या दूसरे शब्दों में कहें, तो इस सुरक्षा का आधार वन यूनिट का वो तरीका था, जिसे खत्म करने के लिए सरकारी अधिकारी कभी-कभी कुछ ऐसा तरीका इस्तेमाल करते, जिससे स्थानीय लोग चिंतित हो जाते थे।

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कराची पाकिस्तान - फोटो : Pixbay
कुछ समय बाद के सर्दी के मौसम की वो एक उदास सी शाम थी, जिसमें खान ऑफ कलात से कायद-ए-आजम के एक जूनियर साथी मिर्जा जवाद बेग की मुलाकात हुई। उन दिनों कराची में सर्दी खूब पड़ा करती थी, जिससे बचने के लिए लोग ओवर कोट भी पहन लिया करते थे। उस शाम खान ऑफ कलात भी ओवर कोट में थे। उनके सिर पर टोपी थी, जो उन्होंने उतार कर एक तरफ रखी और दुख भरे लहजे में कहा "देख लेना मिर्जा! चोर दरवाजों से आने वालों की सत्ता की हवस हमें कहीं का नहीं छोड़ेगी।"

मिर्जा जवाद बेग ने उन दिनों की याद को ताजा करते हुए बताया कि ये वही दिन थे, जब कलात और बलूचिस्तान के कुछ दूसरे शहरों में स्थानीय बुजुर्गों और कबायली मुखियाओं के बीच सलाह मशविरों का दौर जोरों पर था और खान ऑफ कलात महसूस करने लगे थे कि बलूचिस्तान के लोगों की तसल्ली के लिए अगर जल्दी ही ठोस कदम न उठाए गए, तो किसी बड़ी मुश्किल को टालना मुश्किल हो जाएगा। दिन गुजरते गए और बलूचिस्तान के रेगिस्तानों की झुलसा देने वाली गर्मी थोड़ी कम हुई।

ठीक उन्हीं दिनों में कबायली बुजुर्गों के एक प्रतिनिधि मंडल ने कलात में खान से मुलाकात की और उन्हें अपनी सुरक्षा और शिकायत के बारे में छह बिंदुओं का मेमोरेंडम दिया। इसमें उन्हें याद दिलाया गया कि 1948 में कलात रियासत के पाकिस्तान में विलय के समय कायद-ए-आजम ने आपको आश्वासन दिया था कि स्थानीय संस्कृति और परंपरा का सम्मान किया जाएगा और इसकी सुरक्षा की जाएगी, लेकिन बदकिस्मती से अब स्थिति विपरीत है। इस तरह की मुलाकातों का सिलसिला आने वाले दिनों में भी चलता रहा। यहां तक कि आठ अक्तूबर 1957 को बलूचिस्तान के 44 कबायली प्रमुखों का एक प्रतिनिधि मंडल खान ऑफ कलात के नेतृत्व में राष्ट्रपति इस्कंदर मिर्जा से मिला और उन्हें वो ज्ञापन सौंपा, जो कई माह पहले से तैयार किया जा रहा था। इस्कंदर मिर्जा ने उनकी मांगों पर सहानुभूति के साथ विचार करने का वादा किया और खान ऑफ कलात को कुछ बड़े कदम उठाने के लिए कानूनी सलाह लेने का निर्देश दिया।
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इस्कंदर मिर्जा - फोटो : Wikipedia
खान ऑफ कलात और इस्कंदर मिर्जा की वो मुलाकात
प्रतिनिधि मंडल उठ कर जाने लगा, तो राष्ट्रपति इस्कंदर मिर्जा ने खान ऑफ कलात से कहा कि वो उनके निजी मेहमान के तौर पर उनके यहां रुकें। इस तरह खान ऑफ कलात आने वाले 15 दिनों तक यानी सात से 20 अक्टूबर 1957 तक उनके मेहमान के तौर पर राष्ट्रपति भवन में रहे। यही वो 15 दिन हैं, जिनमें इस्कंदर मिर्जा के दिमाग में चलने वाली योजनाओं के पूरा होने के स्पष्ट संकेत दिखने लगे थे। इस्कंदर मिर्जा ने अपनी बात की शुरुआत खान ऑफ कलात की दुखती रग यानी उनकी पूर्व रियासत और वन यूनिट के साथ उनके संबंध से की।

इस्कंदर मिर्जा ने खान ऑफ कलात से ब्रिटेन के एक बड़े कानूनी जानकार मेक नायर का जिक्र किया और सलाह दी कि वो उनसे मुलाकात करें और सलाह लें कि पूर्व रियासत कलात को वन यूनिट से अलग करने का तरीका क्या हो सकता है? खान ऑफ कलात को ये मशवरा ठीक लगा और वो लंदन जाने के लिए तैयार हो गए (इस यात्रा के लिए इस्कंदर मिर्जा ने खान को बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा भी दी) इस्कंदर मिर्जा ने जब महसूस किया कि खान ऑफ कलात अब शीशे में पूरी तरह उतर चुके हैं, तो उन्होंने बात आगे बढ़ाई।
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इनसाइड बलूचिस्तान - फोटो : Amazon
खान ऑफ कलात की किताब 'इनसाइड बलूचिस्तान' में लिखा है कि इस्कंदर मिर्जा ने कहा, "चुनाव सिर पर आ चुके हैं और जैसा कि आप जानते हैं कि मैं अगले कार्यकाल के लिए भी राष्ट्रपति बनने का इरादा रखता हूं। लेकिन, चुनावी मुहिम चलाने के लिए जिस पूंजी की जरूरत है, वो मेरे पास नहीं है। इसके लिए अगर आप अपनी तरफ से 50 लाख रुपए का दान दें तो आसानी हो जाएगी।"

इससे पहले कि खान ऑफ कलात कुछ जवाब देते इस्कंदर मिर्जा ने अपने दिल की पूरी बात उनके सामने रख दी और कहा कि आप बहावलपुर और खैरपुर की पूर्व रियसतों के शासकों पर दबाव डाल कर उनसे भी क्रमशः 40 और 10 लाख रुपए उन्हें दिलवा दें। इसके जवाब में वो राष्ट्रपति बनते ही उनकी रियासत (कलात) के अलावा बहावलपुर और खैरपुर की रियासतों को भी वन यूनिट से अलग कर देंगे।

अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस मुलाकात में आने वाले दिनों में पूर्व रियासतों की कानूनी पोजीशन और आने वाले समय के चुनाव के संदर्भ में आने वाली संभावित मुश्किलों पर विस्तार से चर्चा की गई होगी। खान ऑफ कलात ने लिखा है कि उनकी ये सोची समझी राय थी कि इस्कंदर मिर्जा के लिए रष्ट्रपति पद का अगला कार्यकाल सिर्फ इसी सूरत में यकीनी बनाया जा सकता है, अगर वो देश के पसंदीदा राजनीतिज्ञों के साथ अपने संबंध को दोस्ती में बदल दें। लेकिन, इस्कंदर मिर्जा को ये सलाह पसंद नहीं आई, क्योंकि वो ठान चुके थे कि अगर चुनाव के नतीजे उनकी मर्जी के अनुसार आने की संभावना न हुई, तो वो मार्शल लॉ लगाने से परहेज नहीं करेंगे।

सलाह मशवरों का ये सिलसिला लंबा चलता गया और इस विषय पर अकेले में होने वाली एक मुलाकात में इस्कंदर मिर्जा ने बताया कि उन्होंने भोपाल के नवाब को पाकिस्तान आने का निमंत्रण दिया है और उन्हें प्रधानमंत्री का पद संभालने की पेशकश की है। इस तरह वो खुद राष्ट्रपति बन जाएंगे और देश में मार्शल लॉ लगा दिया जाएगा, जो उस समय तक लागू रहेगा जब तक चुनाव के नतीजे उनकी मर्जी के अनुसार नहीं आ जाते।
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अय्यूब खान - फोटो : Wikipedia
अलग हुए खान ऑफ कलात
खान ऑफ कलात ने लिखा है कि ये बात सुनकर वो बहुत ही हैरत में पड़ गए और उन्होंने सवाल किया कि क्या उन्होंने (इस्कंदर मिर्जा) ने इस संबंध में कमांडर इन चीफ (उस समय फौज के प्रमुख को चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ नहीं कहा जाता था) को विश्वास में ले लिया है? क्योंकि फौज का पूरा नियंत्रण तो उनके हाथ में है। इस्कंदर मिर्जा का जवाब पहले से भी ज्यादा हैरान कर देने वाला था। उन्होंने कहा, "अगर अय्यूब खान ने उनके रास्ते में आने की कोशिश की तो समय बर्बाद किए बिना उन्हें खत्म कर दिया जाएगा।" उस शाम खान ऑफ कलात की, किसी पार्टी में अय्यूब खान से मुलाकात हुई, जिसमें उन्होंने उनसे पश्तो में बात की और इस्कंदर मिर्जा के मंसूबे की तरफ इशारा किया। खान के अनुसार ये सुनकर अय्यूब खान का चेहरा लाल हो गया और उन्होंने कहा कि वो आखिरी व्यक्ति होंगे, जो देश के राष्ट्रपति को ऐसा करने की सलाह देंगे।

अगले ही दिन भोपाल के नवाब सर हमीदुल्लाह खान कराची में थे। यहां सवाल पैदा होता है कि विश्वास का वो कौन-सा रिश्ता था, जिसके आधार पर इस्कंदर मिर्जा ने खान ऑफ कलात को अपना राजदार बनाया और भोपाल के नवाब को देश का सबसे अहम पद सौंपने का फैसला किया? पाकिस्तान के पूर्व विदेश सचिव और नवाब साहब के नवासे शहरयार एम खान की पत्नी बताती हैं कि उन दोनों परिवारों के बीच पुरानी दोस्ती का रिश्ता था। नवाब साहब जब भी पाकिस्तान आए, वो इस्कंदर मिर्जा के यहां ही रुके। इसी तरह इस्कंदर मिर्जा भी आराम करने के लिए कराची के इलाके मलेर में स्थित नवाब साहब के फॉर्म हाउस पर जाते, जो उन्होंने पाकिस्तान की स्थापना के समय खरीदा था।

जैसे ये संबंध भारत और पाकिस्तान की पूर्व रियासतों के शासक परिवारों (यानी भोपाल के नवाब हमीदुल्लाह खान और मुर्शिदाबाद के शासकों के चश्मों चिराग इस्कंदर मिर्जा) के बीच था, बिल्कुल इसी तरह खान ऑफ कलात भी दावा करते हैं कि उनके और भोपाल के नवाब के बीच पुराने दोस्ताना संबंध थे, बल्कि भाईचारे के संबंध थे, जिनमें कोई औपचारिकता की रुकावट नहीं थी। ये तो सवाल ही पैदा नहीं होता कि मुर्शिदाबाद के पूर्व शासक परिवार से संबंध रखने वाले इस्कंदर मिर्जा को भोपाल और कलात के इन दो परिवारों के आपसी संबंध किस तरह के थे, इसके बारे में पता न हो। इसी वजह से उन्होंने अपने भविष्य के राजनीतिक मंसूबे में रंग भरने के लिए उन्हें भी विश्वास में ले लिया।

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सर हमीदुल्लाह खान - फोटो : Wikipedia
कराची पहुंचे भोपाल के नवाब
यही वजह थी कि भोपाल के नवाब ने कराची पहुंचते ही खान ऑफ कलात से मुलाकात की और इस्कंदर मिर्जा की तरफ से की जाने वाली पेशकश पर उनसे मशवरा किया। इस मुलाकात में खान ऑफ कलात और भोपाल के नवाब के बीच होने वाली बातचीत के बारे में भी 'इनसाइड बलूचिस्तान' में विस्तार से लिखा गया है। किताब में लिखा है कि वो दोनों, समय बर्बाद किए बिना असल मुद्दे पर आ गए और मेहमान से उन्होंने उनके पाकिस्तान के दौरे की वजह के बारे में सवाल किया।

नवाब ऑफ भोपाल: "मेरे यहां आने का मकसद वो स्कीम है, जिसमें मेरा नाम शामिल किया गया है। मैंने इस्कंदर मिर्जा की पेशकश स्वीकार कर ली है और अब मैं चाहता हूं कि इस स्कीम की विस्तार से जानकारी हासिल करूं।"

खान ऑफ कलात: "स्थिति अलग भी तो हो सकती है, क्योंकि (मेरी राय में) आपका नाम स्कीम में सिर्फ इसलिए शामिल किया गया है ताकि वो (इस्कंदर मिर्जा) अपना फायदा हासिल कर सकें।" (नवाब इस पर हैरान रह गए)।

नवाब ऑफ भोपाल : "अगर ये बात है तो फिर मेरा इस स्कीम से कोई संबंध नहीं, जो राष्ट्रपति के दिमाग में है।"

खान ऑफ कलात ने लिखा है कि इस बातचीत के बाद मामलात साफ हो गए और मैंने विशवास में लेते हुए उन्हें बताया कि इस्कंदर मिर्जा सत्ता से बाहर होने के डर की वजह से किस तरह के प्रशासनिक उपाय और साजिशों में शामिल हैं।

खान ऑफ कलात ने उन्हें राजनैतिक पार्टियों की गुटबंदी के बारे में विस्तार से बताने के अलावा ये भी बताया कि सत्ता में इस्कंदर मिर्जा के दिन अब गिने चुने हैं। वो बहुत जल्दी राष्ट्रपति के पद से हटाए जाने वाले हैं। वो खुद को इस अंजाम से बचाने के लिए हम दोनों को बलि का बकरा बनाना चाहते हैं। ये सब जानने के बाद नवाब साहब ने खान ऑफ कलात का शुक्रिया अदा किया और कहा, "अल्लाह का शुक्र है कि आपसे मेरी मुलाकात पहले हो गई और मुझे योजना के इस पहलू पर भी विचार करने का मौका मिला।"

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इस्कंदर मिर्जा - फोटो : Wikipedia
पूर्व रियासतों के इन दोनों शासकों के बीच इस्कंदर मिर्जा की योजना पर चर्चा के दौरान, नवाब ऑफ भोपाल को भारतीय सरकार की तरफ से मिलने वाले 20 लाख रुपए (वार्षिक) भत्ता, सम्मान, प्रुस्कार और विशेषाधिकार के अलावा ब्रिटेन में उनके बहुत बड़े कारोबार का भी जिक्र हुआ। इसके अलावा, इस निश्चित संभावना पर भी चर्चा की गई कि इस्कंदर मिर्जा की इस पेशकश को स्वीकार करने पर वो इन सभी चीजों को खो देंगे, जबकि इस्कंदर मिर्जा की योजना की कामयाबी की भी कोई खास संभावना नहीं है। अगले दिन, नवाब ऑफ भोपाल इस्कंदर मिर्जा से मिले, तो उन्होंने उस मौके पर खान ऑफ कलात से होने वाली बातचीत का कोई संदर्भ नहीं दिया।

अपनी सत्ता को बचाने के लिए रचे गए इस बचकाने खेल के लिए उन्होंने अपनी नाराजगी भी जाहिर नहीं की, बल्कि इस्कंदर मिर्जा से कहा कि वो उन्हें कुछ समय दें ताकि वो लंदन में अपने कारोबार और भारत में अपनी संपत्ति के मामलात को ठीक तरह से निपटा सकें। नवाब ऑफ भोपाल के भारत आने के अगले दिन, खान ऑफ कलात और इस्कंदर मिर्जा के बीच एक मुलाकात हुई, जो तीन से चार घंटे तक चली। इस मौके पर इस्कंदर मिर्जा ने खान को बताया कि नवाब उनसे अप्रैल 1958 में वापस आने का वादा करके गए हैं। इस्कंदर मिर्जा ने संदेह व्यक्त किया कि पता नहीं वो आएंगे भी या नहीं जिस पर खान ऑफ कलात ने उन्हें तसल्ली दी।
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इनसाइड बलूचिस्तान - फोटो : Amazon
किताब में खुला राज
पाकिस्तानी राजनीति की इस सनसनीखेज और नाटकीय कहानी की जानकारी खान ऑफ कलात ने अपनी किताब में दी, जो 1975 में प्रकाशित हुई थी। ये सभी घटनाएं केवल तीन व्यक्तियों के बीच थीं, इसलिए इन घटनाओं पर चुप्पी का पर्दा पड़ा रहा। नवाब ऑफ भोपाल ने तो इस्कंदर मिर्जा की योजना से दूरी बना ली, लेकिन इस्कंदर मिर्जा अपनी इच्छाओं पर काबू पाने में नाकाम रहे। अपनी योजना के अनुसार, उन्होंने मार्शल लॉ भी लागू किया, लेकिन वो अपने ही बिछाए हुए जाल में फंस कर रह गए।

उसके बाद दुनिया ही बदल गई और नवाब साहब के परिवार ने पाकिस्तान में बड़े-बड़े पद हासिल किए। उनमें से एक शहरयार एम खान भी हैं, जो पाकिस्तान के विदेश सचिव और पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के प्रमुख बने। बीबीसी ने जब उनसे इन दिलचस्प ऐतिहासिक घटनाओं के बारे में सवाल किया, तो उनके होंठो पर एक फींकी सी मुस्कान आ गई और उन्होंने पुष्टि की "जी हां, नवाब साहब को ये पेशकश की गई थी।"

इसके बाद की कहानी ये है कि इस्कंदर मिर्जा ने अपनी इस नाकामी का गुस्सा खान ऑफ कलात पर उतारा। उन्हें लाहौर की एक जेल में बंद कर दिया गया। खान ऑफ कलात पर आरोप था कि वो बलूचिस्तान को पाकिस्तान से अलग करने की साजिश में शामिल थे। डॉक्टर मोहम्मद वसीम अपनी किताब 'पॉलिटिक्स एंड द स्टेट इन पाकिस्तान' में इस्कंदर मिर्जा के आरोपों को खारिज करते हुए इन सभी घटनाओं को मार्शल लॉ लागू करने का बहाना बताते हैं।
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