अय्यूब खान
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अलग हुए खान ऑफ कलात
खान ऑफ कलात ने लिखा है कि ये बात सुनकर वो बहुत ही हैरत में पड़ गए और उन्होंने सवाल किया कि क्या उन्होंने (इस्कंदर मिर्जा) ने इस संबंध में कमांडर इन चीफ (उस समय फौज के प्रमुख को चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ नहीं कहा जाता था) को विश्वास में ले लिया है? क्योंकि फौज का पूरा नियंत्रण तो उनके हाथ में है। इस्कंदर मिर्जा का जवाब पहले से भी ज्यादा हैरान कर देने वाला था। उन्होंने कहा, "अगर अय्यूब खान ने उनके रास्ते में आने की कोशिश की तो समय बर्बाद किए बिना उन्हें खत्म कर दिया जाएगा।" उस शाम खान ऑफ कलात की, किसी पार्टी में अय्यूब खान से मुलाकात हुई, जिसमें उन्होंने उनसे पश्तो में बात की और इस्कंदर मिर्जा के मंसूबे की तरफ इशारा किया। खान के अनुसार ये सुनकर अय्यूब खान का चेहरा लाल हो गया और उन्होंने कहा कि वो आखिरी व्यक्ति होंगे, जो देश के राष्ट्रपति को ऐसा करने की सलाह देंगे।
अगले ही दिन भोपाल के नवाब सर हमीदुल्लाह खान कराची में थे। यहां सवाल पैदा होता है कि विश्वास का वो कौन-सा रिश्ता था, जिसके आधार पर इस्कंदर मिर्जा ने खान ऑफ कलात को अपना राजदार बनाया और भोपाल के नवाब को देश का सबसे अहम पद सौंपने का फैसला किया? पाकिस्तान के पूर्व विदेश सचिव और नवाब साहब के नवासे शहरयार एम खान की पत्नी बताती हैं कि उन दोनों परिवारों के बीच पुरानी दोस्ती का रिश्ता था। नवाब साहब जब भी पाकिस्तान आए, वो इस्कंदर मिर्जा के यहां ही रुके। इसी तरह इस्कंदर मिर्जा भी आराम करने के लिए कराची के इलाके मलेर में स्थित नवाब साहब के फॉर्म हाउस पर जाते, जो उन्होंने पाकिस्तान की स्थापना के समय खरीदा था।
जैसे ये संबंध भारत और पाकिस्तान की पूर्व रियासतों के शासक परिवारों (यानी भोपाल के नवाब हमीदुल्लाह खान और मुर्शिदाबाद के शासकों के चश्मों चिराग इस्कंदर मिर्जा) के बीच था, बिल्कुल इसी तरह खान ऑफ कलात भी दावा करते हैं कि उनके और भोपाल के नवाब के बीच पुराने दोस्ताना संबंध थे, बल्कि भाईचारे के संबंध थे, जिनमें कोई औपचारिकता की रुकावट नहीं थी। ये तो सवाल ही पैदा नहीं होता कि मुर्शिदाबाद के पूर्व शासक परिवार से संबंध रखने वाले इस्कंदर मिर्जा को भोपाल और कलात के इन दो परिवारों के आपसी संबंध किस तरह के थे, इसके बारे में पता न हो। इसी वजह से उन्होंने अपने भविष्य के राजनीतिक मंसूबे में रंग भरने के लिए उन्हें भी विश्वास में ले लिया।