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आंखों के रास्ते आपके दिमाग को जकड़ रहा ये जिन्न, जानकर हो जाएंगे चौकन्ने

Wed, 10 Oct 2018 08:44 PM IST
फीचर डेस्क, अमर उजाला
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नेटफ्लिक्स की सिरीज गूल का एक सीन, ये एक जिन्न को काबू में पाने की कहानी है।
अगर आप भी सोशल मीडिया में कुछ ज्यादा ही एक्टिव हैं तो ये खबर आप जरूर पढ़िए, आजकल लोग असल दुनिया से ज्यादा आभासी दुनिया (सोशल साइट्स) में रहते हैं, जिसके कारण उन्हें कई परेशानियों का सामना भी करना पड़ रहा है। बच्चों से लेकर बड़े तक लगभग सभी इंटरनेट और स्क्रीन एडिक्शन का एक नया नशा करने लगे हैं, क्योंकि इंटरनेट पर किसी तरह की कोई सीमा नहीं होती।  

'तू पाब्लो एस्कोबार को जानता है? क्या यार! नेटफ्लिक्स पर 'नारकोस' देख न। एक बार देखने बैठेगा न तो पूरा देखकर ही उठेगा।' ऐसी बातें शायद आपने कहीं न कहीं सुनी होंगी। 'पूरा देखकर ही उठेंगे' लत अब तेजी से उन लोगों में फैल रही है जो धीरे-धीरे वर्चुअल दुनिया के करीब और इंसानों और मनोरंजन के पुराने तरीकों से दूर होते जा रहे हैं।

वर्चुअल यानी आभासी दुनिया जो आपको एक ऐसी जगह ले जाती है जिसका हकीकत से नाता नहीं होता। मगर आपको वहां असल दुनिया से ज्यादा सुख मिलता है। मोबाइल, लैपटॉप से लेकर टीवी की स्क्रीन को देखते रहने की लत भी इसी पेड़ की ऐसी शाखा है जिसमें आज की पीढ़ी झूला डालकर झूल रही है और खुश हो रही है।

बंगलुरु में 23 साल का एक लड़का ऑनलाइन स्ट्रीमिंग वेबसाइट की लत का ऐसा शिकार हुआ कि अब उसका वक्त नेटफ्लिक्स, अमेजॉन, यू-ट्यूब सिरीज या वीडियो गेम में नहीं इलाज करवाने में बीत रहा है। 
इस लड़के का इलाज नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेस (NIMHANS) में बीते दो हफ्तों से चल रहा है। ये लड़का दिन-रात नेटफ्लिक्स में कुछ न कुछ देखता रहता था। वजह- असल जिंदगी की परेशानियों से दूर रहना और वर्चुअल सुख को सच मानना।

मगर कोई ऑनलाइन स्ट्रीमिंग वेबसाइट कब लत बनकर आपको असल जिंदगी और अपनों से दूर कर देती है? बंगलुरु के इस मामले के जरिए हमने यही समझने की कोशिश की।
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ये लड़का कैसे हुआ नेटफ्लिक्स का शिकार?

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NIMHANS में इस लड़के का इलाज करने वाले डॉक्टर मनोज कुमार शर्मा ने बीबीसी हिंदी से इस बारे में खास बातचीत की। हालांकि इस लड़के से हमारा संपर्क नहीं हो पाया। डॉक्टर मनोज बताते हैं कि इस लड़के का गेमिंग पर तो कंट्रोल है, लेकिन ऑनलाइन शो देखते हुए काफी समय बीत जाता है।

वक्त की उपलब्धता और शो की वजह से तनावमुक्त रहने की सुविधा के चलते वो कोशिश करता कि सारा वक्त यहीं बिता दे। मना करने पर चिड़चिड़ापना दिखाता है और अपने आप में रहते हुए इसने परिवार से बात करना कम कर दिया था।

ऑनलाइन स्ट्रीमिंग वेबसाइट्स की एक बड़ी लत असल जिंदगी की परेशानियों से ध्यान हटाना भी होती है। असल जिंदगी की परेशानियां जैसे- अच्छी नौकरी, पढ़ाई में अच्छा न कर पाना, किसी और वजह से मानसिक तनाव, ऐसे में इन परेशानियों से ध्यान हटाने के लिए भी लोग अब ऑनलाइन स्ट्रीमिंग वेबसाइट्स की तरफ बढ़ रहे हैं।

जयपुर के अक्षय भी ऑनलाइन स्ट्रीमिंग वेबसाइट्स पर अच्छा खासा वक्त गुजारते हैं। इन वेबसाइट्स में रुचि को लेकर अक्षय कहते हैं कि इसमें वक्त की कोई पाबंदी नहीं होती है। जब चाहे, तब देखो। इनका फायदा ये है कि अगर आपका राजा बाबू देखने का मन करे और उस वक्त बैंडिट क्वीन देखने को मिले तो नहीं देखूंगा। मूड के हिसाब से कंटेंट भी बदलता रहता है। भीड़ में भीड़ से दूर रहना हो तो ये एक साथी जैसा काम करता है।
 
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ऑनलाइन एडिक्शन (लत) के लक्षण क्या हैं?

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डॉक्टर मनोज कहते हैं कि अगर कोई स्क्रीन के सामने लंबा वक्त बिता रहा है तो ये एक बड़ा लक्षण है। हमारे यहां जो केस आए हैं, वो 6-7 घंटे स्क्रीन के सामने बैठने के हैं। लेकिन ऐसे भी लोग हैं जो 14-15 घंटे ऑनलाइन वेबसाइट्स को लगातार देखते हैं।

NIMHANS का मानना है कि एक पहलू ये भी है कि लोग ऑनलाइन स्ट्रीमिंग को सच और असल दुनिया को झूठा मानने लगते हैं। इससे एजुकेशन और शिक्षा पर भी असर होता है।

आंकड़े किस ओर इशारा करते हैं?
नेटफ्लिक्स के आंकड़ों के मुताबिक, 2017 में इस वेबसाइट पर एक दिन में लोगों ने कुल 140 मिलियन घंटे बिताए। नेटफ्लिक्स का एक सब्सक्राइबर औसतन इस साइट पर रोज 50 मिनट गुजारता है।  नेटफ्लिक्स ने 2017 में साल के आखिर में 117 मिलियन सब्सक्राइबर का लक्ष्य रखा था।

स्टेटिस्टा के मुताबिक, अमेजॉन प्राइम वीडियो के 2017 में 40 मिलियन सब्सक्राइबर थे। अनुमान है कि 2020 में तादाद 60 मिलियन यूजर से ज्यादा होगी। सीएनबीसी की एक खबर के मुताबिक, अमेजॉन प्राइम वीडियो में औसतन हर हफ्ते एक यूजर 5 घंटे गुजारता है जबकि नेटफ्लिक्स पर 10 घंटे।
 

टीवी की बजाय नेटफ्लिक्स को तरजीह क्यों?

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डॉक्टर मनोज ने कहा कि कौन किस वक़्त किस तरह से स्क्रीन देख रहा है ये उनके चुनाव पर निर्भर करता है। फिर चाहे टीवी हो, ऑनलाइन वेबसाइट्स हों या मोबाइल गेमिंग, जहां एक्शन होता है। लेकिन यही लोग जब नेटफ्लिक्स जैसी जगह पर जाते हैं तो आराम के लिए जाते हैं।

दिल्ली में पढ़ाई कर रही मोनिका भी नेटफ्लिक्स देखती हैं। अपनी दिलचस्पी के बारे में वो कहती हैं कि जब आप मुझसे बात कर रहे हैं, तब भी मैं 'द पनिशर' देख रही हूं। इन साइट्स में कुछ देखने की सबसे अच्छी बात ये है कि आप एक साथ सारे एपिसोड देख सकते हैं। एचबीओ की सिरीज गेम ऑफ थ्रोन्स या टीवी की तरह आपको महीनों तक इंतजार नहीं करना होता है। लेकिन पूरी सिरीज एक बार में मिल जाने से दर्शकों की जो बेचैनी होती है, वो नहीं होती।

जयपुर के अक्षय कहते हैं कि टीवी में अगर कहीं रोने का सीन आने वाला है और माहौल बन रहा है तो टीवी का विज्ञापन उस माहौल को तोड़ देता है। ऑनलाइन स्ट्रीमिंग वेबसाइट्स में ऐसा नहीं है। अक्षय ने बताया कि अगर सिरीज अच्छी है या अवसाद वाले दिन हैं तो 5 से लेकर 10 घंटे तक भी देख साइट्स पर वक्त गुजरता है।
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स्क्रीन की लत: क्या वाकई बड़ी समस्या?

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बंगलुरु के NIMHANS अस्पताल में तकरीबन हर हफ्ते 8 से 10 ऐसे मामले आ रहे हैं। इसमें ऑनलाइन गेमिंग भी शामिल है।

इस बीमारी का इलाज क्या है?

इस सवाल के जवाब में डॉक्टर मनोज ने कहा कि हमें सबसे पहले ये मानना होगा कि कुछ लोग मानसिक, व्यावहारिक कारणों से ऐसा करते हैं तो उनमें ज्यादा देख लिया जाता है। लेकिन कुछ लोग खाली वक्त में ये शो देखने लगते हैं। सबसे पहले ऐसी किसी भी आदत की पहचान करना जरूरी है। जैसे पांच-छह मिनट में स्क्रीन की तरफ जाए बिना खुद को रोक न सकें।

 
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खुद पहचानें कि आप असल दुनिया में ज्यादा हैं या वर्चुअल में

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अपने आप को रोकने की कोशिश करें, सोते वक्त की ऑनलाइन एक्टिविटी को दूर करें, जैसे - मोबाइल से लेकर लैपटॉप में कुछ देखना, अगर इन कोशिशों के बाद भी असर न हो तो डॉक्टर के पास जाएं।ऑफलाइन मनोरंजन के साधनों की तरफ फिर लौटना होगा।

NIMHANS में डॉक्टर मनोज शर्मा ने कहा कि डॉक्टर के पास जाने का ये फायदा होगा कि वो आपकी लाइफस्टाइल पर भी काम करेगा। अगर सरकारी अस्पताल में इलाज करवाएं तो एक अप्वॉइंटमेंट में करीब 100 रुपये लगते हैं। लेकिन प्राइवेट सेटअप में 500 से हजार रुपये तक लग सकते हैं।
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क्या ये समस्या सिर्फ भारत तक है?

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बाहर के देशों में ऑनलाइन गेमिंग को मेंटल हेल्थ कंडीशन मान लिया गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने गेमिंग को डिसॉर्डर माना है। इसमें सिर्फ ऑनलाइन वेबसाइट्स ही नहीं, सोशल मीडिया भी शामिल है।डॉक्टर मनोज बताते हैं कि बाहर के देशों में भारत की तरह इस पर रिसर्च हो रही है।
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