आज भारत समेत दुनिया के बहुत से देश अपने यहां आधुनिक लड़ाकू विमान बनाते है, लेकिन दूसरे विश्व युद्ध तक ऐसा नहीं था। गिने चुने देश ही ऐसे थे, जिनके पास लड़ाकू विमान बनाने की तकनीक थी और वो इसे उन्हीं देशों को देते थे, जो भरोसेमंद हों।
दूसरे विश्व युद्ध से पहले उस समय की सुपरपावर ब्रिटेन ने अपने लड़ाकू विमान बनाने के ठेके कनाडा को दे रखे थे। जो ब्रिटेन के लिए हॉकर हरीकेन फाइटर और एवरो लैंकैस्टर बॉम्बर विमान बनाता था। जब शीत युद्ध शुरू हुआ, तो दुनिया में असुरक्षा को देखते हुए, हथियारों की मांग बढ़ गई। इनमें लड़ाकू विमान भी शामिल थे। तब कनाडा ने दूसरे विश्व युद्ध के अपने तजुर्बे का फायदा उठाते हुए एक लड़ाकू विमान बनाने की सोची।इस बार कनाडा, किसी ब्रिटिश या अमेरिकी डिजाइन पर नहीं, बल्कि खुद का डिजाइन किया हुआ विमान बनाना चाहता था।