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रिकॉर्ड बनाने वाला कनाडा का वो लड़ाकू विमान, जिसका नहीं हो सका इस्तेमाल

Sun, 12 Jul 2020 03:03 PM IST
नवनीत राठौर फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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एवरो एयरक्राफ्ट का पहला लड़ाकू विमान - फोटो : Canada Aviation and Space Museum
आज भारत समेत दुनिया के बहुत से देश अपने यहां आधुनिक लड़ाकू विमान बनाते है, लेकिन दूसरे विश्व युद्ध तक ऐसा नहीं था। गिने चुने देश ही ऐसे थे, जिनके पास लड़ाकू विमान बनाने की तकनीक थी और वो इसे उन्हीं देशों को देते थे, जो भरोसेमंद हों।

दूसरे विश्व युद्ध से पहले उस समय की सुपरपावर ब्रिटेन ने अपने लड़ाकू विमान बनाने के ठेके कनाडा को दे रखे थे। जो ब्रिटेन के लिए हॉकर हरीकेन फाइटर और एवरो लैंकैस्टर बॉम्बर विमान बनाता था। जब शीत युद्ध शुरू हुआ, तो दुनिया में असुरक्षा को देखते हुए, हथियारों की मांग बढ़ गई। इनमें लड़ाकू विमान भी शामिल थे। तब कनाडा ने दूसरे विश्व युद्ध के अपने तजुर्बे का फायदा उठाते हुए एक लड़ाकू विमान बनाने की सोची।इस बार कनाडा, किसी ब्रिटिश या अमेरिकी डिजाइन पर नहीं, बल्कि खुद का डिजाइन किया हुआ विमान बनाना चाहता था।
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एवरो एयरक्राफ्ट का पहला लड़ाकू विमान - फोटो : Canada Aviation and Space Museum
इस काम को अंजाम दिया कनाडा की कंपनी एवरो एयरक्राफ्ट ने। 4 अक्टूबर 1957 को एवरो एयरक्राफ्ट के पहले लड़ाकू विमान ने उड़ान भरी। इसे देखने के लिए 14 हजार लोग कनाडा के टोरंटो शहर में जुटे थे। उस समय एरो फाइटर प्लेन माख 2 यानी 1500 मील प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ सकता था। इसमें और तेज उड़ान की संभावनाएं थी। कनाडा ने इस फाइटर विमान को डिजाइन करके, विमानन की दुनिया का सुपरपावर बनने का ख्वाब देखा था। लेकिन, 20 फरवरी 1959 को अचानक एलान किया गया कि एवरो एयरक्राफ्ट कंपनी बंद की जा रही है। और एरो फाइटर प्लेन का निर्माण भी अब नहीं होगा। ये फैसला कनाडा के उस वक्त के प्रधानमंत्री जॉन डिफेनबेकर ने लिया था क्योंकि अमेरिका या ब्रिटेन के मुकाबले कनाडा के पास इतने पैसे और संसाधन नहीं थे।
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एवरो एयरक्राफ्ट का पहला लड़ाकू विमान - फोटो : Canada Aviation and Space Museum
रातों रात एवरो एयरक्राफ्ट के करीब पंद्रह हजार कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया गया। एरो फाइटर के सभी प्रोटोटाइप नष्ट कर दिए गए। कनाडा के विमानन इतिहास में 20 फरवरी 1959 को ब्लैक फ्राइडे कहा जाता है।

एरो ने कनाडा को फाइटर विमानों वाली महाशक्ति तो नहीं बनाया लेकिन उसने एक और महाशक्ति यानी अमेरिका के चांद पर पहुंचने के ख्वाब को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। एवरो एयरक्राफ्ट कंपनी से निकाले गए कनाडा के 32 इंजीनियरों ने नासा के अपोलो स्पेस मिशन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। जिसकी मदद से अमेरिका ने स्पेस रेस में सोवियत संघ को शिकस्त दी।

कनाडा के एविएशन और स्पेस म्यूजियम की निरीक्षक एरिन ग्रेगरी कहती हैं कि, 'दुनिया में ऐसे बहुत से कम देश हैं, जिन्होंने एक एयरक्राफ्ट विकसित करने में इतने पैसे खर्च किए और फिर उन्हें सेवा में नहीं लिया।'

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एवरो एयरक्राफ्ट का पहला लड़ाकू विमान - फोटो : Canada Aviation and Space Museum
कनाडा ने उस समय करीब 158 अरब डॉलर की रकम से एरो फाइटर प्लेन का विकास किया था। पर आगे उसके लिए बाजार नहीं दिख रहा था। कनाडा की इतनी हैसियत नहीं थी कि वो इस विमान को लगातार बना कर इकट्ठा करता रहे और मौका मिलने पर बेच सके। वो अमेरिका या ब्रिटेन नहीं था।

एविएशन पर ब्लॉग लिखने वाले जो कोल्स कहते हैं कि, "उच्च तकनीक वाले रक्षा प्रोजेक्ट बहुत महंगे होते हैं। अगर अपने ही देश से बड़े ऑर्डर की गारंटी न हो, तो ऐसे प्रोजेक्ट चलाना बहुत मुश्किल होता है।"
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एवरो एयरक्राफ्ट का पहला लड़ाकू विमान - फोटो : सोशल मीडिया
कनाडा ने ये विमान इसलिए विकसित किया क्योंकि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान उसे बॉम्बर और फाइटर प्लेन बनाने का तजुर्बा था। 1949 में कनाडा के इंजीनियरों ने 102 नाम का जेट लाइनर यानी यात्री विमान भी बनाया था, जो पूरे उत्तरी अमेरिका में पहला यात्री विमान था। आगे चल कर एवरो एयरक्राफ्ट की योजना तश्तरी जैसे यान बना कर अंतरिक्ष में भेजने की भी थी। साथ ही कंपनी, अटलांटिक के आर पार के सफर के लिए एक सुपरसोनिक जेट बनाने पर भी काम कर रही थी।

कनाडा के रॉयल मिलिट्री कॉलेज के प्रोफेसर रैंडल वेकलम कहते हैं , "एवरो कंपनी शानदार थी। उसकी उपलब्धियां कनाडा के विमानन क्षेत्र की सुपरपावर बनने के ख्वाब को पूरा करती थी। कनाडा की सरकार अपने देश को विमान बनाने वाले छोटे देश से अमेरिका और ब्रिटेन जैसी महाशक्ति बनाना चाहती थी।"
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एवरो एयरक्राफ्ट का पहला लड़ाकू विमान - फोटो : Canada Aviation and Space Museum
1950 में जब कोरिया में युद्ध छिड़ा तो कनाडा के रक्षा मंत्री ने एवरो से कहा कि वो जेटलाइनर बनाना छोड़े और फाइटर प्लेन बनाए। 1954 में कनाडा की एयरफोर्स ने भी एक फाइटर प्लेन का टेंडर निकाला। इससे एवरो एयरक्राफ्ट के इंजीनियरों को अपने लिए एक मौका मिला। 1957 में एरो फाइटर प्लेन पहली उड़ान भरने के लिए तैयार था। मगर ये इतना विकसित विमान था कि कनाडा के पास इसकी टेस्टिंग तक की सुविधा नहीं थी। इस विमान को अमेरिका में नेशनल कमेटी फॉर एरोनॉटिक्स के रिसर्च सेंटर में ले जाकर टेस्ट किया गया। यही अमेरिकी कमेटी आगे जाकर नासा में तब्दील की गई। नासा के वैज्ञानिक, कनाडा के इंजीनियरों का कमाल देख कर हैरान थे। उन्होंने भी एरो फाइटर प्लेन में दिलचस्पी दिखाई। मगर, 1959 में कंपनी और प्रोजेक्ट दोनों को कनाडा की सरकार ने बंद कर दिया।

कनाडा के इस फैसले से अमेरिका को बहुत फायदा हुआ। एरो फाइटर प्लेन के प्रोजेक्ट पर काम कर रहे अधिकतर कनाडाई इंजीनियरों को नासा ने अपने यहां रख लिया। जिन्होंने उसके मर्करी, जेमिनी और अपोलो मिशन को अंजाम तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी।
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एवरो एयरक्राफ्ट का पहला लड़ाकू विमान - फोटो : Canada Aviation and Space Museum
एरो फाइटर प्लेन प्रोजेक्ट बंद होने के साथ ही कनाडा का विमानन महाशक्ति बनने का ख्वाब अधूरा रह गया। हालांकि, जानकार कहते हैं कि अगर एरो फाइटर प्लेन बनाना जारी भी रहता, तो भी शायद कनाडा का ये सपना अधूरा ही रहता। क्योंकि, कनाडा की सरकार के पास इतने पैसे नहीं थे कि मांग न होने के बावजूद वो इस प्रोजेक्ट को जारी रख पाती।

हालांकि, उस वक्त के कनाडा के नागरिकों का विजन आज काम आ रहा है। आज कनाडा में दुनिया की पांचवीं बड़ी एरोस्पेस इंडस्ट्री काम कर रही है। जो कनाडा को भारी मुनाफा कमा कर दे रही है।
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