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Bihar News: आधी रात को इस शक्ति पीठ में माता को परोसा गया 56 भोग, हाड़ कंपाने वाली ठंड में भी उमड़ा जनसैलाब

Wed, 15 Jan 2025 02:47 PM IST
हिमांशु प्रियदर्शी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सहरसा

सार

Saharsa News: उग्रतारा मंदिर में मकर संक्रांति पर छप्पन भोग चढ़ाने की परंपरा सदियों पुरानी है। माना जाता है कि भगवान बुद्ध और ऋषि वशिष्ठ ने भी माता को 56 भोग अर्पित कर उनकी विशेष पूजा की थी। जानें महत्व...।
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उग्रतारा मंदिर शक्तिपीठ - फोटो : अमर उजाला
सहरसा के महिषी स्थित प्रसिद्ध शक्तिपीठ उग्रतारा मंदिर में मकर संक्रांति के पावन अवसर पर माता को 56 भोग अर्पित करने की सदियों पुरानी परंपरा को श्रद्धा और उल्लास के साथ निभाया गया। ठिठुरती ठंड के बावजूद हजारों श्रद्धालु देर रात तक माता के दर्शन और भोग के प्रसाद के लिए मंदिर में मौजूद रहे।
 
आधी रात को परोसा गया 56 भोग
जानकारी के मुताबिक, मंगलवार रात माता उग्रतारा को 56 भोग अर्पित किया गया। इसमें नवधान्य से बनी खिचड़ी, खीर, दही, मिठाई और अन्य विशेष व्यंजन शामिल थे। मंदिर के पुजारी ने बताया कि यह भोग सभी के कल्याण और सुख-शांति के लिए परोसा जाता है। श्रद्धालुओं ने माता के चरणों में प्रणाम कर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की। इस आयोजन में आसपास के जिलों और दूरदराज से भी श्रद्धालु बड़ी संख्या में पहुंचे।
 
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उग्रतारा मंदिर शक्तिपीठ में अर्पित किया गया 56 भोग - फोटो : अमर उजाला
सदियों पुरानी परंपरा और महत्ता
उग्रतारा मंदिर में मकर संक्रांति पर छप्पन भोग चढ़ाने की परंपरा सदियों पुरानी है। माना जाता है कि भगवान बुद्ध और ऋषि वशिष्ठ ने भी माता को 56 भोग अर्पित कर उनकी विशेष पूजा की थी। माता उग्रतारा को तंत्र साधना के लिए विशेष रूप से पूजनीय माना जाता है। मान्यता है कि बिना माता के आदेश के तंत्र साधना पूरी नहीं होती।
 
महिषी में स्थित शक्तिपीठ का ऐतिहासिक महत्व
महिषी का उग्रतारा स्थान शक्ति पीठों में एक प्रमुख स्थल है। शक्ति पुराण के अनुसार, सती के शरीर के 52 हिस्सों में विभक्त होने पर जहां-जहां उनके शरीर के अंग गिरे, वे स्थान सिद्ध पीठ के रूप में प्रसिद्ध हुए। महिषी में सती का बायां नेत्र गिरा था।
 
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उग्रतारा मंदिर शक्तिपीठ में अर्पित किया गया 56 भोग - फोटो : अमर उजाला
मंदिर में भगवती तीन स्वरूपों उग्रतारा, नील सरस्वती और एकजटा में विराजमान हैं। मान्यता है कि माता उग्रतारा अपने भक्तों के सभी कष्टों और व्याधियों का नाश करती हैं। इसी कारण इन्हें उग्रतारा नाम दिया गया।
 
श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र
उग्रतारा मंदिर में पूरे साल श्रद्धालुओं का आवागमन लगा रहता है, लेकिन मकर संक्रांति पर यहां का माहौल विशेष रूप से उल्लासमय हो जाता है। इस बार भी श्रद्धालुओं की आस्था ठंड के आगे झुकी नहीं। भक्तों ने देर रात तक मंदिर पहुंचकर माता के दर्शन किए और प्रसाद ग्रहण किया।
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