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American Automobile Brands: अमेरिकी कार और बाइक कंपनियां भारत में क्यों नहीं चला पाईं गाड़ी? जानें असल वजह

Tue, 03 Feb 2026 10:42 PM IST
अमर शर्मा ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

दुनिया के सबसे बड़े ऑटोमोबाइल बाजारों में से एक होने और भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर नए सिरे से ध्यान देने के बावजूद, अमेरिकी कार और टू-व्हीलर ब्रांड भारत में अभी भी मामूली खिलाड़ी बने हुए हैं।
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2024 Chevrolet Equinox EV - फोटो : General Motors

भारत जैसे विशाल ऑटोमोबाइल बाजार के बावजूद अमेरिकी कार और दोपहिया ब्रांड देश में अब भी सीमित मौजूदगी तक ही सिमटे हुए हैं। भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर दोबारा फोकस के बीच यह सवाल फिर उठ रहा है कि क्या आने वाले वर्षों में अमेरिकी ऑटो ब्रांड भारत में कोई ठोस वापसी कर पाएंगे, या वे किसी खास मार्केट तक ही सीमित रहेंगे।

बिक्री में बेहद सीमित हिस्सेदारी
ऑटोमोटिव एनालिटिक्स फर्म जाटो डायनैमिक्स इंडिया के आंकड़ों के अनुसार, कैलेंडर वर्ष 2025 में भारत की कुल पैसेंजर व्हीकल (PV) बिक्री में अमेरिकी ब्रांड्स की हिस्सेदारी सिर्फ 0.10 प्रतिशत रही। दोपहिया बाजार में यह आंकड़ा और भी छोटा, महज 0.0013 प्रतिशत, दर्ज किया गया।

यह गिरावट लगातार देखी गई है। जहां 2021 में अमेरिकी पैसेंजर कार ब्रांड्स की हिस्सेदारी 1.45 प्रतिशत थी, वहीं 2025 तक यह घटकर 0.10 प्रतिशत रह गई। इस दौरान गैर-अमेरिकी कंपनियों का दबदबा बढ़कर लगभग 99.9 प्रतिशत तक पहुंच गया।

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Ford Ecosport - फोटो : Ford

प्रोडक्ट और बाजार के बीच तालमेल की कमी
जाटो डायनैमिक्स इंडिया के अध्यक्ष और डायरेक्टर रवि भाटिया का कहना है कि पिछले पांच वर्षों में अमेरिकी ब्रांड्स का प्रदर्शन मिला-जुला रहा है।
उनके मुताबिक, Jeep ने प्रीमियम एसयूवी सेगमेंट में एक स्थिर निच बनाई, जबकि Tesla (टेस्ला), जिसने 2025 में भारत में एंट्री की, ऊंचे आयात शुल्क के कारण सिर्फ 160 गाड़ियां ही बेच पाई।वहीं, Harley-Davidson ने लोकलाइजेशन के जरिए दोबारा रफ्तार पकड़ी, लेकिन Ford (फोर्ड) और Chevrolet (शेवर्ले) जैसे ब्रांड्स वॉल्यूम और प्रतिस्पर्धा बनाए रखने में नाकाम रहे और आखिरकार भारत से बाहर हो गए।
 

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Harley Davidson X440 - फोटो : Harley Davidson

संरचनात्मक चुनौतियां बनीं बड़ी बाधा
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी कंपनियों की सबसे बड़ी कमजोरी भारत के वैल्यू-ड्रिवन सेगमेंट, जैसे कॉम्पैक्ट एसयूवी और फ्यूल-एफिशिएंट एंट्री मॉडल, के अनुरूप प्रोडक्ट न ला पाना रही।
ऊंची ऑपरेटिंग लागत, जटिल रेगुलेटरी ढांचा और सीमित लोकलाइजेशन ने उनकी व्यवहारिकता को और कमजोर किया।

इसके उलट, Harley-Davidson (हार्ले-डेविडसन) का उदाहरण दिखाता है कि लोकल को-डेवलपमेंट, बेहतर कीमत और सटीक सेगमेंट टारगेटिंग से भारत में पकड़ बनाई जा सकती है। 

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Chevrolet Spark - फोटो : Chevrolet
आयात शुल्क और कीमत की चुनौती
भारत में पूरी तरह आयातित (CBU) वाहनों पर भारी टैक्स एक और बड़ी बाधा है। 40,000 डॉलर तक की कारों पर 70 प्रतिशत बेसिक कस्टम ड्यूटी लगती है, जबकि इससे महंगी कारों पर कुल टैक्स लगभग 110 प्रतिशत तक पहुंच जाता है।
ग्रांट थॉर्नटन भारत के ऑटो और ईवी लीडर साकेत मेहरा के मुताबिक, यही वजह है कि Ford (फोर्ड), Chevrolet (शेवर्ले) और कई अमेरिकी टू-व्हीलर ब्रांड्स भारत में स्केल हासिल नहीं कर पाए।

 
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Jeep Wrangler USA - फोटो : Jeep
आगे की राह: निच, लेकिन मौके मौजूद
क्रिसिल इंटेलिजेंस के डायरेक्टर हेमल ठक्कर का मानना है कि भारत में सफलता के लिए प्रोडक्ट कस्टमाइजेशन सबसे अहम है।
भविष्य में Jeep जैसे ब्रांड प्रीमियम एसयूवू सेगमेंट में आगे बढ़ सकते हैं, जबकि Harley-Davidson की ग्रोथ लोकल मैन्युफैक्चरिंग पर टिकी रहेगी।

India-US ट्रेड डील से उम्मीद, लेकिन शर्तें भी
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2 फरवरी को भारत-अमेरिका ट्रेड डील की घोषणा की, जिसमें भारतीय उत्पादों पर अमेरिकी टैरिफ घटाने और भारत में अमेरिकी उत्पादों पर ड्यूटी शून्य करने की बात कही गई।

हालांकि विश्लेषकों का कहना है कि सिर्फ टैरिफ कटौती काफी नहीं होगी। गहरी लोकलाइजेशन, मजबूत सर्विस नेटवर्क और लंबी प्रतिबद्धता के बिना अमेरिकी ब्रांड्स भारत में निच से आगे नहीं बढ़ पाएंगे। 
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2025 Harley-Davidson Street Bob - फोटो : Harley-Davidson
निष्कर्ष: भारत बड़ा बाजार, लेकिन आसान नहीं 
भारत का ऑटो बाजार दुनिया के सबसे बड़े बाजारों में से एक है, लेकिन यहां टिके रहने के लिए कीमत, प्रोडक्ट और स्थानीय जरूरतों, तीनों पर बराबर फोकस जरूरी है। अमेरिकी ब्रांड्स के लिए मौका अब भी है, मगर सफलता का रास्ता लंबा और रणनीति-आधारित होगा। 

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