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Dangerous Driving Hour: रात 9-10 बजे ड्राइविंग पड़ सकती है भारी! वाहन चलाने के लिए सबसे खतरनाक समय का खुलासा

Thu, 25 Jun 2026 05:36 PM IST
Amar Sharma ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

अगर आप लंबी ड्राइव की योजना बना रहे हैं, तो केवल रास्ता ही नहीं, बल्कि दिन का समय भी आपके लिए बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है। एक नई सड़क सुरक्षा रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि भारत में रात 9 बजे से 10 बजे के बीच वाहन चलाना सबसे ज्यादा जोखिम भरा है। वहीं, दोपहर 1 बजे से 2 बजे के बीच ड्राइविंग सबसे सुरक्षित मानी गई है।
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Road Accident - फोटो : संवाद

अगर आप किसी लंबी दूरी के सफर की योजना बना रहे हैं, तो दिन का कौन सा समय आप ड्राइविंग के लिए चुन रहे हैं, यह आपकी सोच से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है। सड़क सुरक्षा को लेकर हुए एक नए अध्ययन में बेहद चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय सड़कों पर ड्राइविंग के लिए रात 9 बजे से 10 बजे के बीच का समय सबसे ज्यादा जोखिम भरा होता है। इसके उलट, दोपहर में 1 बजे से 2 बजे के बीच गाड़ी चलाना सबसे सुरक्षित माना गया है।

यह महत्वपूर्ण जानकारी एक इंश्योरेंस कंपनी द्वारा जारी की गई 'इंडिया रोड सेफ्टी रिपोर्ट (IRSR) 2026' से सामने आई है। इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए कंपनी के एप के 17 राज्यों में फैले 27,000 से अधिक एक्टिव यूजर्स के डेटा का विश्लेषण किया गया। जिसमें 4.5 मिलियन (45 लाख) से अधिक ट्रिप्स और 55 मिलियन (5.5 करोड़) किलोमीटर से ज्यादा की ड्राइविंग का डेटा शामिल है। 

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Road Accident - फोटो : अमर उजाला

रात 9 से 10 बजे के बीच ही क्यों बढ़ जाता है खतरा?

अध्ययन के अनुसार, दिन के ज्यादातर समय में लोगों का ड्राइविंग व्यवहार अपेक्षाकृत स्थिर रहता है, लेकिन रात 8 बजे के बाद इसमें गिरावट आनी शुरू हो जाती है।

  • रात का गिरता स्कोर: रात 9 बजे से 10 बजे के बीच ड्राइवरों का औसत ड्राइविंग स्कोर गिरकर 86 पर आ जाता है, जो पूरे दिन में सबसे कम है। यही वजह है कि यह समय वाहन चालकों के लिए सबसे खतरनाक बन जाता है।

  • दोपहर का सबसे सुरक्षित सफर: इसकी तुलना में, दोपहर 1 बजे से 2 बजे के बीच ड्राइवरों ने 93 का औसत स्कोर दर्ज किया, जो विश्लेषण किए गए सभी टाइम स्लॉट्स में सबसे अधिक और सुरक्षित है।

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Car Driving - फोटो : Adobe Stock

क्या महिलाएं पुरुषों से बेहतर गाड़ी चलाती हैं?

यह रिपोर्ट ड्राइविंग से जुड़े कुछ आम मिथकों और धारणाओं को भी चुनौती देती है:

  • समान ड्राइविंग स्कोर: रिपोर्ट में महिला और पुरुष ड्राइवरों के स्कोर में कोई बड़ा अंतर नहीं पाया गया। महिलाओं ने 92.86 और पुरुषों ने 92.43 का लगभग एक जैसा ड्राइविंग स्कोर हासिल किया।

  • व्यवहार है जरूरी: इस आंकड़े से साफ होता है कि सड़क के जोखिम को समझने के लिए ड्राइवर का लिंग या डेमोग्राफिक फैक्टर्स मायने नहीं रखते। बल्कि उसका ड्राइविंग व्यवहार ही असली तस्वीर दिखाता है। 

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Car Driving - फोटो : Adobe Stock

भारतीय ड्राइवरों की सबसे खराब आदतें कौन सी हैं?

शोधकर्ताओं ने भारतीय वाहन चालकों के ड्राइविंग व्यवहार में कुछ मुख्य कमजोरियों की पहचान की है, जो दुर्घटनाओं का कारण बनती हैं:

  • अचानक ब्रेक लगाना: इसे भारतीय ड्राइवरों की सबसे कमजोर कड़ी माना गया है, जिसका औसत स्कोर केवल 87 रहा।

  • अचानक तेज रफ्तार पकड़ना: इस आदत को 91 का स्कोर मिला। अचानक ब्रेक लगाने और तेज एक्सीलेटर दबाने जैसी आदतें असुरक्षित ड्राइविंग को दर्शाती हैं। और हादसों की संभावना को बढ़ा देती हैं।

  • मौसम का कोई असर नहीं: दिलचस्प बात यह है कि बदलते मौसम का ड्राइविंग पैटर्न पर कोई खास असर नहीं देखा गया। गर्मी, मानसून और सर्दी, तीनों ही मौसमों में औसत ड्राइविंग स्कोर काफी हद तक एक समान रहे। इससे साफ है कि मौसम की स्थिति से ज्यादा ड्राइवर का खुद का व्यवहार सड़क सुरक्षा में बड़ी भूमिका निभाता है। 

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Road Accident - फोटो : अमर उजाला

देश में सड़क हादसों के आंकड़े कितने डरावने हैं?

यह रिपोर्ट देश में सड़क सुरक्षा को लेकर एक बड़ी चिंता की ओर इशारा करती है:

  • 80% हादसों की वजह व्यवहार: रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में होने वाले 80 प्रतिशत से अधिक सड़क हादसों के पीछे मानवीय व्यवहार से जुड़े कारण होते हैं। इसमें ओवरस्पीडिंग (तय गति से तेज गाड़ी चलाना), ड्राइविंग के दौरान ध्यान भटकना और सड़क के असुरक्षित तौर-तरीके शामिल हैं।

  • वैश्विक मौतों में 11% हिस्सेदारी: भारत में हर साल लगभग 1.73 लाख लोग सड़क हादसों में अपनी जान गंवाते हैं। जो दुनिया भर में सड़क पर होने वाली कुल मौतों का लगभग 11 प्रतिशत है।

  • अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान: इन हादसों का देश की अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर पड़ता है। अनुमान के मुताबिक, सड़क दुर्घटनाओं के कारण देश की जीडीपी (GDP) को 3 से 5 प्रतिशत तक का आर्थिक नुकसान होता है।

  • युवा वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित: सड़क हादसों में जान गंवाने वाले लोगों में से लगभग दो-तिहाई लोग 18 से 45 वर्ष की उम्र के होते हैं।

  • कमजोर सड़क उपयोगकर्ता: हादसों का सबसे बुरा असर दोपहिया वाहन चालकों और पैदल चलने वालों पर पड़ता है। भारत में कुल सड़क मौतों में 44 प्रतिशत हिस्सेदारी दोपहिया सवारों की और लगभग 19 प्रतिशत हिस्सेदारी पैदल चलने वालों की होती है।

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