Bus Accidents In India: देश में स्लीपर बसे चलता-फिरता ताबूत बन रही हैं। स्लीपर बसों में चलते-चलते आग लगने की कई घटनाएं सामने आती रहती है। बसों में आग लगने की कई वजहें हो सकती हैं, लेकिन मुख्य कारण मेंटेनेंस का अभाव और गड़बड़ी की अनदेखी है।
बिहार से दिल्ली आ रही स्लीपर बस में आग लगने से 2 बच्चों समत 5 लोग जिंदा जल गए। यह हादसा उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में तड़के सुबह हुआ। बताया जा रहा है कि हादसे के समय यात्री सोए हुए थे। हादसे से समय बस ड्राइवर और कंडक्टर ने कूद कर जान बचा ली। जानकारी के मुताबिक आग की हालत में बस 1 किलोमीटर तक चलती रही, जिसके चलते आग ने पीछे की सीटों में बैठे यात्रियों को अपनी चपेट में ले लिया। बस में सवार कुछ यात्रियों ने निकलने के लिए आगे के दरवाजे की तरफ भागने की कोशिश की, जबकि कुछ ने खिड़कियों को तोड़कर अपनी जान बचाई। बस में लगा इमरजेंसी गेट भी हादसे के वक्त नहीं खुला। स्लीपर बस में आग लगने की घटना पहले भी कई बार हो चुकी है। आइए जानते हैं कि क्यों स्लीपर बसे यात्रियों के लिए चलता फिरता ताबूत बन रही हैं और इसमें कहां सुधार करने की जरूरत है।
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बस में लगी आग
- फोटो : X
देश में 25 हजार हैं स्लीपर बसें
बता दें कि देश में लगभग 7 करोड़ लोग हर रोज बसों से सफर करते हैं। देश में कुल 22 लाख से ज्यादा बसें रजिस्टर्ड हैं, जिनमें 25,000 से ज्यादा स्लीपर बसे हैं। आंकड़ों के मुताबिक, भारत और पाकिस्तान को छोड़कर किसी अन्य देश में इतनी स्लीपर बसें नहीं चलती हैं। देश में 18 लाख प्राइवेट बसे हैं, जबकि केवल 1.4 लाख बसें ही सरकारी और राज्य परिवहन से संबंध रखती हैं। 2 लाख ई-बसें प्राइवेट तौर पर चल रही हैं।
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बसों में मौत का सफर
- फोटो : संवाद
बसों में मौत का सफर
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के डेटा के मुताबिक, 2018 से 2021 के बीच बसों से सफर में कुल 22,442 लोगों ने अपनी जान गंवाई है। इनमें अकेले 5,000 मौतें यूपी में हुई हैं। वहीं, 2015-17 के बीच 11,000 लोगों की मौत बस के सफर में हुई। सालाना आकड़ों को देखें तो हर साल करीब 10,000 लोग इस तरह के हादसों में अपनी जान गंवा रहे हैं।
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धू-धू कर जली दो बसें
- फोटो : अमर उजाला डिजिटल
नियमों को ताक पर रखती हैं बस कंपनियां
बस चलाने वाली कंपनियां सुरक्षा नियमों की भारी अनदेखी करती हैं। कई बसों में आग से निपटने के लिए फायर फाइटिंग इक्विपमेंट नहीं होते। बसों में इमरजेंसी एग्जिट के लिए दरवाजे भी नहीं बनाए जाते। बस में आग लगने की स्थिती में ज्यादातर लोग बाहर न निकल पाने के चलते मारे जाते हैं। बसों में वेंटिलेशन की भी कमी होती है जिससे लोगों की मौत दम घुटने के वजह से भी हो जाती है। इसके अलावा जल्दी पहुंचने के लिए बसों को सुरक्षित स्पीड से ज्यादा पर चलाया जाता है। अधिक स्पीड के वजह से ड्राइवर इमरजेंसी हालातों में बस को कंट्रोल नहीं कर पाते।
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नहीं होती ड्राइवरों की ट्रेनिंग
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
नहीं होती ड्राइवरों की ट्रेनिंग
इसके अलावा आग लगने की स्थिती में ड्राइवर को क्या करना चाहिए, इसकी ट्रेनिंग भी नहीं दी जाती है। उन्हें बस में मौजूद सेफ्टी इक्विपमेंट को यूज कैसे करना है और मदद कैसे बुलानी है, इसके बारे में भी नहीं बताया जाता है। कई ट्रैवल कंपनियां नौसिखिए ड्राइवर्स को काम पर रख लेती हैं जिन्हें ट्रैफिक नियमों के बारें में पूरी जानकारी नहीं होती।
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नींद बनती है दुर्घटना का कारण
- फोटो : संवाद
नींद बनती है दुर्घटना का कारण
बस हादसों के ज्यादातर मामलों में ड्राइवर को नींद आना वजह होती है। लंबे रूट में रात तो बस चलाते समय ड्राइवर को झपकी आने से हादसे होते हैं। हाइवे और ग्रामीण सड़कों पर यात्रा करते समय ड्राइवरों के सो जाने की संभावना अधिक होती है। रात 2 बजे से सुबह 5 बजे तक नींद आने की आशंका ज्यादा रहती है।
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चीन में बैन हैं स्लीपर बसें
- फोटो : AdobeStock
चीन में बैन हैं स्लीपर बसें
चीन में इन बसों से जुड़ी कई घातक दुर्घटनाएं हुई हैं। सुरक्षा संबंधी बढ़ती घटनाओं के कारण, चीन में स्लीपर बसों के पंजीकरण पर 2012 से प्रतिबंध लगा हुआ है। वहीं, चीन में रात 2 बजे से सुबह 5 बजे तक बस चलाने पर प्रतिबंध है।
बसों के लिए सख्त नियमों की जरूरत
- फोटो : AdobeStock
बसों के लिए बनाए जाएं सख्त नियम
बसों से होने वाले होदसों को रोकने के लिए सख्त नियम बनाना समय की मांग है। बस मालिक सुरक्षा नियमों का अनिवार्य रूप से पालन करें इसके लिए कानून बनने चाहिए। बसों के रखरखाव और सेफ्टी स्टैंडर्ड के लिए रेगुलर चेकिंग और पुराना होने पर उन्हें हटाने के लिए भी सख्त नियम बनने चाहिए। खराब बसों को चलाने वाले ऑपरेटरों पर कानूनी कार्रवाई के लिए कानून में संशोधन की भी जरूरत है।