वास्तु विज्ञान से अभिप्राय है कि सभी दिशाओं से मिलने वाली ऊर्जा तरंगों का संतुलन होना। यदि ये ऊर्जा संतुलित रूप से आपको प्राप्त हो रही हैं, तो घर में सुख-शांति बनी रहेगी। वास्तु में माना जाता है कि भवन निर्माण के समय दिशाओं और विदिशाओं का ध्यान रखना बहुत आवश्यक है। वास्तु शास्त्र में कुल नौ दिशाओं का उल्लेख किया गया है। इन सभी दिशाओं के स्वामी और तत्व अलग-अलग होते है। आप वास्तु के कुछ सरल नियमों के माध्यम से दिशाओं को संतुलित कर सकते हैं।
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वास्तुशास्त्र में दिशाओं का महत्व
- फोटो : अमर उजाला
पश्चिम दिशा
यह दिशा वायु तत्व का प्रतिनिधित्व करती है और इसके स्वामी वरुणदेव हैं। लाभ की इस दिशा को बंद या दूषित करने से जीवन में निराशा, तनाव, आय में रूकावट और अधिक खर्चे होने का डर बना रहता है। पश्चिम की तुलना में पूर्व दिशा में और दक्षिण की तुलना में उत्तर दिशा में ज्यादा खुली और हल्की जगह होनी चाहिए।
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vastu tips
उत्तर दिशा
जल तत्व का प्रतिनिधित्व करने वाली उत्तर दिशा को मातृ भाव से जुड़ा हुआ माना गया है और इसके स्वामी कुबेर हैं। इस दिशा के दूषित या बंद होने से धन, शिक्षा और सुख की कमी एवं जीवन में तरक्की के नए अवसर की कमी बनी रहती है। इस दिशा का खुला, साफ और हल्का होना आवश्यक है।
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दक्षिण दिशा
दक्षिण दिशा के स्वामी यम हैं। इस दिशा का खुला और हल्का रखना दोषपूर्ण है। इस दिशा में दरवाजे और खिड़कियां होने से रोग, शत्रुभय, मानसिक अस्थिरता एवं निर्णय लेने में कमी जैसी परेशानियां होने लगती हैं। भवन में भारी-भरकम निर्माण दक्षिण दिशा की ओर करवाना शुभ माना गया है। इससे घर के सदस्यों का स्वास्थ्य अच्छा बना रहता है।
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दक्षिण-पूर्व दिशा
आग्नेय कोण के रूप में यह दिशा अग्नि तत्व को प्रभावित करती है। इस दिशा के स्वामी अग्नि देव हैं। इस दिशा के दूषित या बंद होने से स्वास्थ्य समस्या आती है तथा आग लगने से जान एवं माल को नुकसान पहुँचने का भी भय बना रहता है।इस दिशा में जल से जुड़ा कोई कार्य नहीं करना चाहिए वरना अशुभ परिणाम उठाने पड़ सकते है।
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वास्तु उपाय
दक्षिण-पश्चिम दिशा
पृथ्वी तत्व का प्रतिनिधित्व करने वाली इस दिशा को नैऋत्य कोण कहा जाता है एवं इस दिशा के स्वामी नैरुत देव हैं।इसके दूषित होने से शत्रुभय,आकस्मिक दुर्घटना एवं चरित्र पर लांछन जैसी समस्याएं आती हैं। गृहस्वामी का कमरा इस दिशा में होना सेहत और धन की दृष्टि से अच्छा माना गया है। इसके अलावा कैश काउंटर, मशीनें,भारी वस्तुएं आदि आप दक्षिण-पश्चिम दिशा में रख सकते हैं लेकिन घर में इस दिशा में पौधे नहीं रखने चाहिए।
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furniture vastu
उत्तर-पश्चिम दिशा
यह दिशा वायव्य कोण वायु तत्व और वायु देवता से जुडी हुई है।इस दिशा के बंद या दूषित होने से शत्रुभय,रोग,शारीरिक शक्ति में कमी और आक्रामक व्यवहार देखने को मिलता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार घर में धातु की चीज़ें रखने के लिये सबसे सही दिशा पश्चिम और वायव्य कोण, यानी उत्तर-पश्चिम दिशा है। इन दोनों ही दिशाओं में धातु की चीजें रखना शुभ फलदायी माना गया है।
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उत्तर-पूर्व दिशा
वास्तु शास्त्र में यह दिशा ईशान कोण के नाम से जानी जाती है। अत्यंत पवित्र मानी जाने वाली इसी दिशा में पूजाघर वास्तु सम्मत है। इसके दोषपूर्ण होने से साहस की कमी,अस्त-व्यस्त जीवन,कलह एवं बुद्धि भ्रमित होने का अंदेशा रहता है। इस दिशा में गंदगी या शौचलय बिल्कुल भी नहीं होना चाहिए,ऐसा होने से यह अनेक रोग और मानसिक परेशानियों का कारण बन सकता है।
ब्रह्मस्थान या केंद्र
आकाश,भवन के मध्य भाग को माना जाता है। ईशान कोण की तरह इस दिशा को भी स्वच्छ और पवित्र रखना आवश्यक माना गया है अन्यथा जीवन में कष्ट,बाधा एवं,तनाव,कहलाह एवं चोरी आदि समस्यायों का सामना करना पद सकता है।यहाँ भारी-भरकम सामान रखने या निर्माण से बचना चाहिए ।ब्रह्मस्थान में सीढ़ी,वीम,खंभा,भूमिगत पानी की टंकी,बोरिंग,सेप्टिक टैंक,शौचालय इनका निर्माण नहीं किया जाना चाहिए। इस जगह झाड़ू,पौंछा आदि वस्तुएं बिल्कुल न रखें। ब्रह्मस्थान पर कभी भी अग्नि से सम्बंधित कार्य नहीं करें,क्यों कि ऐसा करने से परिवार के सदस्यों में मन-मुटाव हो जाता है।