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गोचर करते हुए शनिदेव आपकी कुंडली के 12 भावों में कैसे देते हैं फल

Wed, 07 Oct 2020 05:24 PM IST
विनोद शुक्ला पं जयगोविंद शास्त्री, ज्योतिषाचार्य
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फलित ज्योतिष में शनिदेव को लंबे शरीर वाला, लाल-लाल आंखें, भूरे रंग वाला, मोटे केश और बड़े-बड़े दांतों वाला बतलाया गया है। ये मृत्यु लोक के दंडाधिकारी हैं। मकर तथा कुंभ राशि के स्वामी शनि तुला राशि में उच्चराशिगत तथा मेष राशि में नीच राशिगत संज्ञक कहे गए हैं। प्राणियों के जीवन में सफलता और असफलता का ग्राफ काफी कुछ इन्हीं की कृपा पर निर्भर करता है। आपकी जन्मकुंडली में शनिदेव किस भाव में है और उसका क्या फल रहेगा इसका ज्योतिषीय विश्लेषण करते हैं।  
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प्रथम भाव- किसी भी जातक की जन्मकुंडली में यदि शनिदेव प्रथम भाव में रहते हैं तो जातक को भौतिक सुखों की प्राप्ति तो करवाते हैं किंतु उसकी कार्य गतिविधियों पर भी नजरे जमाए रहते हैं। जातक के अंदर तरह-तरह के विकार उत्पन्न होने की संभावना बनी रहती है। नीच राशि के शनि स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डालते हैं किंतु स्वग्रही या उच्चराशि का होने पर राजयोग का निर्माण करते हैं। इस भाव में बलवान शनि जातक की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं तथा उसे अध्यात्म का गूढ़ ज्ञान भी देते हैं।
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द्वितीय भाव- इस भाव में शनिदेव जातक के लिए मिलाजुला फल देते हैं काफी प्रबल संभावना रहती है कि ऐसे लोंगों को वाणी दोष तथा दाहिनी आंख से संबंधित बीमारी का सामना भी करना पड़ता हैं। रोचक घटना यह भी रहती है कि जातक के निवास स्थान के दाहिनी तरफ के पड़ोसियों से कुछ न कुछ विवाद बना रहता है। इस भाव में शनिदेव की शुभस्थिति व्यक्ति को आर्थिक रूप से काफी मजबूत बनाती है किंतु अशुभ स्थिति के परिणाम स्वरूप आर्थिक हानि का सामना भी करना पड़ता है।

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तृतीय भाव- किसी भी जातक की जन्मकुंडली में यदि शनिदेव तृतीय भाव में हों तो वह अति उत्साही, पराक्रमी तथा अपने साहस के बलपर विषम परिस्थितियों से लड़ते हुए विजय प्राप्त करने वाला होता है। ऐसे व्यक्ति छोटे स्तर से कार्य करते हुए जीवन के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचते हैं और उन्हें अपना परिचय कराने की आवश्यकता नहीं रहती वे समाज में अच्छी ख्याति प्राप्त करते हैं। ऐसे लोगों को भाइयों से सहयोग तो नहीं मिलता किंतु यह स्वयं उनके सहयोग के लिए तत्पर रहते हैं।
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चतुर्थ भाव- किसी भी व्यक्ति की कुंडली में यदि शनिदेव चतुर्थ भाव में होते हैं तो वह इस बात का संकेत होता है कि जातक को जीवन में कठोर संघर्षों का सामना करना पड़ेगा। अशुभ स्थिति हो तो ये प्राणी को मानसिक रूप से अति प्रताड़ित करते हैं और माता-पिता में से एक का सुख छीन लेते हैं या किसी एक का स्वास्थ्य हर समय खराब रहता है। ऐसे लोगों को मित्रों तथा संबंधियों से नुकसान उठाना पड़ता है। शनिदेव शुभ हों अथवा अपने घर में या उच्च राशि के हों तो सभी ऐश्वर्य प्रदान करते हैं।
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पंचम भाव- जिन जातकों की जन्म कुंडलियों में शनि देव पंचम विद्या भाव में होते हैं उन्हें शिक्षा-प्रतियोगिता में धीरे-धीरे सफलता मिलती है। कहीं न कहीं इन्हें संतान संबंधी चिंता भी परेशान करती रहती है। प्रेम संबंधी मामलों में ऐसे लोगों को निराशा हाथ लगती है और भावनाओं में बहकर किए गए प्रेम विवाह में भी बाद में परेशानियां आती हैं। शनिदेव का अपने घर में अथवा शुभ स्थिति में रहने से व्यक्ति शिक्षा और समाज के क्षेत्र में नए मापदंड स्थापित करता है। आर्थिक रूप से ऐसे लोग मजबूत रहते हैं।
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छठा भाव- जन्म कुंडली में शनिदेव की छठेभाव में स्थिति जातक के सभी अरिष्टों का शमन करते हुए उन्हें शत्रु विजयी बनाती है। कोर्ट कचहरी के मामलों में भी ऐसे लोग विजय प्राप्त करते हैं तथा रोजगार की दिशा में भी पूर्ण सफल रहते हैं। समाज में भी अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखने में पूर्ण सफल रहते हैं। इस भाव में अशुभ राशि में शनि की स्थिति स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डालती है तथा जातक को कर्ज के बोझ तले दवे रहने का संकेत देती है। ऐसे लोगों को अधिक कर्ज के लेन-देन से बचना चाहिए।

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सातवें भाव- इस भाव में शनिदेव की स्थिति जातक को दांपत्य जीवन में कठिनाइयों का सामना करवाती है। ससुराल पक्ष से भी रिश्ते बहुत अच्छे नहीं रहते। कार्य व्यापार की दृष्टि से अनिश्चितता का माहौल रहता है तथा साझा व्यापार करने से भी भारी नुकसान का सामना करना पड़ता है। शासन सत्ता तथा उच्चाधिकारियों से ऐसे लोगों को मधुर संबंध बनाए रखना चाहिए और जहां तक संभव हो झगड़े-विवाद से बच के रहना चाहिए। इनकी शुभ स्थिति संघर्षों को शीघ्र समाप्त करने में मददगार सिद्ध होती है।

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आठवां भाव- इस भाव में शनि देव की स्थिति काफी मिले-जुले फल कारक रहती है नीच अथवा अशुभ राशि में होने पर ये व्यक्ति से कठोर संघर्ष करवाते हैं जातक को छोटी-छोटी सफलताओं के लिए भी कठोर परिश्रम करना पड़ता है। स्वास्थ्य पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है और किसी लंबी बीमारी के होने का खतरा निरंतर बना रहता है। उच्चराशिगत अथवा अपनी ही राशि में शनिदेव के होने पर जातक दीर्घायु तथा महाप्रतापी होता है। समाज में उसके द्वारा लिए गए निर्णय और किए गए कार्यों की सराहना होती है।

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नवम भाव- इस भाव में शनिदेव जातक को धीरे धीरे सफलताओं की ओर अग्रसर करते हैं कई बार कार्य बाधाओं के कारण ऐसे लोग निराश होने लगते हैं क्योंकि, जो कार्य दो दिन में होना चाहिए था उसे होने में दो हफ्ते लग जाते हैं। अपने जीवट-जुझारू स्वभाव के कारण ऐसे लोग कठिन परिस्थितियों से लड़कर मंजिल तक पहुंचने में सफल रहते हैं। इनकी शुभा-शुभ स्थिति जातक को आस्तिक और नास्तिक दोनों बना सकती हैं। अच्छी स्थिति विदेशी कंपनियों से लाभ अथवा विदेशों में निवास का मार्ग प्रशस्त करती है।

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मकर राशि में शनि
दशम भाव- इस भाव में शनिदेव का रहना जातक के लिए कई मायनों में वरदान की तरह है। प्रतियोगिता के क्षेत्र में भी ऐसे लोग पूर्ण सफल रहते हैं किंतु माता-पिता में से किसी एक का सुख कम रहता है। शुभस्थिति अथवा उच्च राशिगत शनि होने पर व्यक्ति का राजयोग पूर्ण फलित रहता है और वह स्वयं शासन सत्ता का सुख भोगता है। राजनीति अथवा सामाजिक क्षेत्रों में ऐसे लोग खूब सफल रहते हैं। अशुभ शनि जातक की पद प्रतिष्ठा को भी प्रभावित करते हैं और उसमें विरक्ति भाव लाकर सन्यास की ओर प्रेरित करते हैं।

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शनि 2020
एकादश भाव- इस भाव में शनिदेव जातक के जीवन में बड़े भाई के सुख का अभाव लाते हैं किंतु ऐसे लोग अपनी ऊर्जा शक्ति के बलपर छोटे पद से कार्य आरंभ करते हुए जीवन के सर्वोच्च शिखर तक पहुंचते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में ऐसे लोगों को कई बार बाधाओं का सामना करना पड़ता है किंतु इन सब पर विजय प्राप्त करते हुए ऐसे जातक सफल उद्यमी और प्रशासनिक अधिकारी होते हैं। शनि नीचराशिगत अथवा अशुभ हों तो रुकावटों के बाद ही सफलता मिलती है। स्वास्थ्य के प्रति ऐसे लोगों को हमेशा गंभीर रहना चाहिए।
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shani transit 2020 - फोटो : shani transit 2020
बारहवें भाव- इस भाव में शनिदेव का रहना जातक को कई तरह के अप्रत्याशित परिणाम दिलाता है। ऐसा व्यक्ति कला प्रेमी और शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाला तो होता है किन्तु उसके शत्रु बनते रहते हैं और नष्ट भी होते रहते हैं। स्वास्थ्य की दृष्टि से ऐसे लोगों को आंख की बीमारी से बचना चाहिए। कोर्ट कचहरी के मामले तथा झगड़े विवाद से भी हमेशा दूर रहना चाहिए अन्यथा षड्यंत्र का शिकार होने की संभावना बनी रहती है। जीवन में यात्राओं की अधिकता रहती है और आर्थिक तंगी का भय बना रहता है।
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