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सफला एकादशी 2021: जानिए कब है सफला एकादशी, इसका महत्व और व्रत, पूजा विधि

Sat, 02 Jan 2021 08:09 PM IST
Shashi Shashi ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला
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सफला एकादशी (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Social media
हर माह की ग्याहरवीं तिथि को एकादशी कहते हैं इस तरह से एक माह में दो और पूरे साल में 24 एकादशी तिथियां पड़ती हैं। हिंदू कैलेंडर के अनुसार पौष माह में कृष्ण पक्ष की एकादशी को सफला एकादशी कहा जाता है। इसे पौष एकादशी के नाम से भी जानते हैं। इस दिन भगवान विष्णु और उनके अवतार भगवान श्री कृष्ण का पूजन किया जाता है। एकादशी का व्रत सभी व्रतों में श्रेष्ठ माना गया है। सफला एकादशी का भी बहुत महत्व माना गया है। माना जाता है कि इस व्रत को पूरी निष्ठा और नियम के साथ करने व्यक्ति को सौभाग्य और सफलता की प्राप्ति होती है। जानते हैं सफला एकादशी का महत्व, तिथि और व्रत की पूजा विधि... 
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Lord vishnu - फोटो : file photo
सफला एकादशी का महत्व-
सफला एकादशी के बारे में माना जाता है कि सौ राजसूय यज्ञों को करने से भी इतना पुण्य फल प्राप्त नहीं होता है जितना फल सफला एकादशी का व्रत नियम और निष्ठा से करने पर मिलता है। सफला शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है समृद्ध होना, सफल होना। इसलिए जीवन में समृद्धि और सफलता के लिए सफला एकादशी का व्रत बहुत ही लाभकारी माना गया है। मान्यता है कि इस व्रत को करने से सौभाग्य, धन वृद्धि, समृद्धि, सफलता और वृद्धि के द्वार खुलते हैं।
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सफला एकादशी(प्रतीकात्मक तस्वीर)
सफला एकादशी तिथि-
एकादशी तिथी आरंभ- 08 जनवरी 2021 रात्रि 09 बजकर 40 मिनट से (शुक्रवार)
एकादशी तिथि समाप्त-09 जनवरी 2021 रात्रि 07 बजकर 15 मिनट तक (शनिवार)

व्रत पारण तिथि समय- 10 जनवरी 2021 सुबह 07 बजकर 15 मिनट से सुबह 09 बजकर 21 मिनट तक
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सफला एकादशी (प्रतीकात्मक तस्वीर)
सफला एकादशी व्रत पूजा विधि-
  • सफला एकादशी के दिन प्रातः जल्दी उठकर स्नानादि करने के पश्चात व्रत के संकल्प करें।
  • अपने पूजाघर में या मंदिर जाकर भगवान विष्णु की विधिवत् धूप दीप से पूजा करें।
  • उन्हें तुलसी के पत्ते, अगरबत्ती, सुपारी, फल और नारियल आदि अर्पित करें।
  • सफला एकादशी व्रत के महात्मय की कथा पढ़ें।
  • पूजा संपन्न हो जाने के बाद आरती करें।
  • इस दिन भगवान विष्णु के साथ कृष्ण जी की पूजा भी करना चाहिए। 
  • संध्या समय में आप मंदिर जाकर या घर पर ही कृष्ण जी की दीप जलाकर पूजा करें।
  • एकादशी तिथि को रात्रि जागरण का बहुत महत्व माना गया है।
  •  रात में जागकर भगवान के भजन कीर्तन करें।
पारण विधि-
एकादशी की व्रत द्वादशी तिथि यानि दूसरे दिन पारण किया जाता है। इसलिए द्वादशी तिथि को स्नानादि करके पूजन करें उसके बाद भोजन बनाकर किसी ब्राह्मण को खिलाएं और दान दक्षिणा देकर उन्हें विदा करें। तत्पश्चात स्वयं भी भोजन ग्रहण करें।
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