हिन्दू धर्म में सूर्य ग्रहण से जुड़ी मान्यताएं
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ऋग्वेद में सूर्य ग्रहण का वर्णन
ऋग्वेद में सूर्य ग्रहण को असुर स्वरभानु से जोड़ा गया है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, स्वरभानु नामक असुर ने छलपूर्वक अमृत पान किया था, जिससे वह अमर हो गया। लेकिन भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। अमृत पान कर लेने के कारण उसका सिर राहु और धड़ केतु के रूप में अमर हो गए। तभी से यह दोनों ग्रह समय-समय पर सूर्य और चंद्रमा को ग्रसने का प्रयास करते हैं, जिससे ग्रहण की घटना होती है। ऋषि अत्रि ने अपने मंत्रों के माध्यम से सूर्य को मुक्त करने का उपाय बताया था।