नौतपा
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शास्त्र कहते हैं कि केवल सूर्य की ही आराधना से ही मनुष्य की जन्मकुंडली में विराजमान सभी ग्रहदोषों से मुक्ति मिलती है। प्रत्यक्ष देवता सूर्य और चन्द्र में दोनों में ही पूर्व के जन्मों के पाप शमन करने शक्ति रहती है। 'पूर्व जन्म कृतं पापं व्याधि रूपेण जायते' अर्थात पूर्व के जन्मों में किया गया पाप रोग के रूप में उत्पन्न होता है। इन्हें अर्घ्य देकर और प्रणाम करके ही प्राणी भवसागर से मुक्त हो जाता है। जैसे रत्नों का आश्रय मेरुपर्वत,आश्चर्यों का आश्रय आकाश,तीर्थों का आश्रय गंगा हैं उसी प्रकार सभी देवाताओं के आश्रय भगवान सूर्य हैं। देवगण भी भगवान सूर्य की ही आराधना करते हैं। इस चराचर जगत में सभी प्राणियों के हृदय के ही सूर्य का निवास है यही जगतात्मा हैं,इनके रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश और नौतपा के आरम्भ होने के परिणामस्वरूप गर्मी और लू से बचने के उपाय करते रहें।