मुश्किलें दिल के इरादे आजमाती हैं, स्वप्न की परतें नजरों से हटाती हैं, पंख होने से कुछ नहीं होता, मंजिल उन्हीं को मिलती है, जिनके सपनों में जान होती है।
ये पंक्तियां चमोली जिले के छोटे से गांव सिवाईं-पनाई के 33 वर्षीय अनुज पर सटीक बैठी। तीन साल पहले सड़क हादसे में एक पैर गंवाने के बाद भी शारीरिक विकलांगता उनके हौसले को नहीं डिगा सकी।
अनुज ने कठिन परिश्रम और बुलंद इरादों के दम पर क्याकिंग औ केनोइंग (नौकायन) में तीन नेशनल गोल्ड मेडल और एक सिल्वर मेडल जीता है। अब ओलंपिक में देश का नाम रोशन करने में आर्थिक तंगी बाधा बन रही है।
अनुज के सिर से करीब 15 साल पहले पिता का साया उठ गया। चार भाई और बहिनों की जिम्मेदारी मां शांति देवी पर आ गई। अनुज की दो बड़ी बहिन सुषमा और रेखा की शादी हो चुकी है। बड़ा भाई स्वास्थ्य विभाग में संविदा कर्मचारी है।
अनुज छोटे से ही अपने चाचा बलबीर सिंह के साथ में रहा। वह मंगलौर के सरकारी अस्पताल में फार्मासिस्ट के पद तैनात हैं। अनुज ने रुड़की में आर्मी और पुलिस के जवानों को गंगनहर में नौकायन करते देखा तो उन्होंने भी नौकायन का सपना देखा और तैयारी में जुट गया।