खेल दिवस के मौक पर आज अमर उजाला आपको उत्तरखंड में खेल और खिलाड़ियों को हालात से रूबरू करवा रहा है।
कबड्डी को ग्लैमराइज करने और आगे बढ़ाने के लिए कई नामी हस्तियों ने टीमें लेकर लीग में उतार दीं हैं। इसे डाउन द मार्केट खेल कहने वाले अब खुद मुकाबले के दौरान बक अप कहते सुने जा सकते हैं। इससे इतर बात करें तो अपने यहां हाल एकदम अलग है। इस पर एक नजर...
बीता वक्त...
कबड्डी में खिलाड़ी अच्छा कर रहे हैं। कम-से-कम नेशनल लेवल पर। तकरीबन साल भर ही हुआ होगा सीनियर ब्वायज टीम की अच्छी प्लेसिंग रही। बालकों का प्रदर्शन बालिकाओं के मुकाबले बेहतर रहा है। खास तौर पर बीईजी रुड़की, पुलिस, जौनसार आदि के खिलाड़ियों ने राज्य का नाम किया है।
आज का हाल...
मैट केवल युवा कल्याण विभाग के पास है। आयोजन होते हैं तो वह इसे निकाल लाता है। एसोसिएशन के पास अपनी मैट नहीं। इसका नुकसान खिलाड़ियों को हो रहा है। इसके बावजूद अपने स्तर पर कोशिश करने वाले खिलाड़ी आगे निकले हैं।
कोच किशन डोभाल की मानें तो आयोजनों की संख्या भी बढ़ाने की जरूरत है। अभी सरकारी स्तर पर जो प्रतियोगिताएं हो रही हैं, बस उन्हीं का सहारा है। निजी स्तर पर भी खेल को पसंद करने वाले लोगों को आगे आना होगा। यह महंगा खेल भी नहीं।
हॉकी : सिंथेटिक टर्फके इंतजार में पथरा रहीं आंखें
‘चक दे इंडिया’ फिल्म में शाहरूख खान के हॉकी की स्टिक के साथ नजर आने के बाद ग्राउंड पर हॉकी लिए खिलाड़ी नजर आने लगे थे, लेकिन वक्त के साथ फिल्म का क्रेज खत्म हुआ तो मैदान से खिलाड़ी भी गायब हो गए। वर्तमान में इसका नामलेवा भी नजर नहीं आता। यह है हाल...
बीता वक्त....
भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) छात्रावास रहने तक हॉकी में बालिकाओं ने खूब नाम रोशन किया। शिवानी, शिखा बिष्ट ऐसी ही खिलाड़ियों में शुमार थीं। इस वक्त रेलवे की तरफ से नाम रोशन कर रही हैं।
आज हालात...
वर्तमान में हालात खराब हैं। विद्यालयी हॉकी के नाम पर तो शून्य है। मूलभूत सुविधाएं तक मुहैया नहीं। सिंथेटिक टर्फ बिछाए जाने की बात सालों से हो रही है, लेकिन यह बिछ नहीं सका है।
इससे भी बड़ी समस्या यह है कि स्टेट एसोसिएशन को यह नहीं मालूम कि वह हॉकी इंडिया के साथ कार्य करे या फिर इंडियन हॉकी फेडरेशन यानी आईएचएफ के साथ। कोच पीके महर्षि दोहराते हैं कि अगर यह क्लियर हो जाए तो हॉकी एसोसिएशन और खिलाड़ियों दोनों के लिए काफी सुविधा हो जाए।
कल की उम्मीद...
बालकों के साथ बालिकाओं से अधिक उम्मीद लगी है। अगर ग्राउंड मुहैया हो जाए और जिले से लेकर ब्लाक लेवल तक स्कूलों में मूलभूत सुविधाएं तो हाकी की तस्वीर निश्चित रूप से बदल सकती है। खेल से जुड़े लोग खास तौर पर स्पोर्ट्स कालेज से अच्छे रिजल्ट की उम्मीद लगाए हुए हैं।
शूटिंग : पदकों की चमक पर सरकारी अंधेरा
शूटिंग! इस खेल ने उत्तराखंड बनने के बाद पदकों की चमक दिखाई। लेकिन आज महंगा होने की वजह से इसमें बहुत खिलाड़ी आगे नहीं आ रहे।
शुरुआती लेवल पर केवल ट्रेनिंग में एक माह में पांच हजार से अधिक का खर्च खिलाड़ी पर आता है। सरकारी मदद की आस में शूटिंग निशाना चूक रही है। कुछ ऐसा है इस खेल का हाल...
बीता वक्त...
जसपाल, अभिनव बिंद्रा चमके
उत्तराखंड का नाम देश-विदेश में चमकाने में जिस खेल ने सबसे अहम भूमिका निभाई वह शूटिंग है। इस खेल में जसपाल राणा, अभिनव बिंद्रा जैसे शूटरों ने बुलंदियों को छुआ। लेकिन उनके बाद कोई नाम उभरकर सामने नहीं आया है। स्कूली लेवल से ही खिलाड़ियों को आगे बढ़ाने की जरूरत थी, जो नहीं हुआ।
आज हाल...
शूटिंग रेंज नहीं, एकेडमी नहीं, हाल खराब
इस वक्त सरकारी स्तर पर कोई संस्थान या एकेडमी नहीं, जो शूटिंग का प्रशिक्षण दे रही हो। राष्ट्रीय इंडियन मिलिट्री कालेज (आरआईएमसी), ओएनजीसी, यूनिसन वर्ल्ड को छोड़ दें तो कहीं शूटिंग रेंज नहीं। लेकिन इनका लाभ केवल इन संस्थानों के लिए है।
दो निजी एकेडमियों के सहारे खिलाड़ी हैं। कोच मयंक मारवाह बताते हैं कि लगभग चार साल पहले उत्तरांचल स्टेट राइफल एसोसिएशन ने स्पोर्ट्स कॉलेज, परेड ग्राउंड में शूटिंग रेंज बनवाने, स्पोर्ट्स कॉलेज में शूटिंग को खेल के रूप में शामिल कराने के लिए एक प्रस्ताव भेजा था, लेकिन अब तक यह धूल खा रहा है। खेल नीति कहीं नहीं है, जिसका नुकसान खिलाड़ी भुगत रहे हैं।
फुटबॉल : बाहर की टीमें आएं बदलें हालात
देहरादून में 70 का दशक फुटबॉल का स्वर्णिम दौर कहा जाता है। तब इस खेल को लेकर क्रेज का आलम यह था कि लोग पवेलियन ग्राउंड के बाहर से पेड़ पर बैठकर मुकाबले का नजारा करते थे।
आर्मी सेंटर का सबसे बड़ा फायदा यहां फुटबॉल को मिला, लेकिन धीरे-धीरे उनकी रुखसती हो गई। 70 के दशक में इंडिया के क्रिकेट का वर्ल्ड कप जीतने के साथ क्रिकेट का ग्लैमर फुटबॉल को खा गया। फिलहाल यह है हाल...
बीता वक्त...
ओलंपियन राम बहादुर क्षेत्री, वीर बहादुर, श्याम थापा, अमर बहादुर गुरुंग जैसे कई नाम हैं, जिनके नाम फुटबॉल की दुनिया में बड़े आदर के साथ लिए जाते हैं। ये वह वक्त था, जब यहां के खिलाड़ियों ने विदेशी जमीन पर अपने कदमों का जादू जगाया। इनमें से आज भी कई उस वक्त को याद कर खुश हो लेते हैं।
आज का हाल....
फुटबॉल में पहले जैसा वक्त ढूंढेंगे तो निराश हो जाएंगे। चंद नाम हैं, जो चमक रहे हैं। मसलन, मनीष मैठाणी। वह इंटरनेशनल प्लेयर हो चुके हैं। फुटबाल के जाने-माने नाम अमर बहादुर गुरुंग के अनुसार इस वक्त सबसे ज्यादा समस्या यह आ रही है कि खिलाड़ियों को नौकरी नहीं मिल रही।
स्टेट कोटा तो छोड़िए, इंटरनेशनल खिलाड़ी तक को नौकरी नहीं मिल पा रही, लिहाजा खिलाड़ी बाहर के राज्यों, खिलाड़ियों को प्राथमिकता दे रहे हैं। ऐसे कई खिलाड़ियों के नाम उंगली पर गिनाए जा सकते हैं, जो अगर सुविधा मिलती तो इस वक्त राज्य का नाम रोशन कर रहे होते।
सरकार को पता नहीं कब समझ आएगी। फिलहाल क्लबों के बीच मैच हो रहे हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर। बाहरी की इसमें हिस्सेदारी है ही नहीं।
क्रिकेट : सुविधाओं पर मान्यता की जंग भारी
क्रिकेट! जिसे बेहद दौलत और शोहरत का खेल माना जाता है, का हाल भी उत्तराखंड में खराब है।
यहां सरकारी स्तर पर भले ही सुविधा के नाम पर अब 250 करोड़ की लागत से क्रिकेट स्टेडियम निर्माणाधीन हो, लेकिन निजी एकेडमियों के खिलाड़ी चमक रहे हैं।
यह बात अलग है कि एसोसिएशन को मान्यता का मसला न सुलझने से उन्हें दूसरे राज्यों का रुख करना पड़ा है। यह है हाल...
बीता वक्त...
प्रदेश में जन्मे महेंद्र सिंह धोनी पिता के झारखंड चले जाने की वजह से रांची की शान बन गए तो वहीं कुमाऊं के उन्मुक्त चंद ने अंडर-19 से अपना लोहा मनवाया। मनीष पांडे भी आईपीएल से चमके।
आज हाल...
2000 में उत्तरांचल बनने और उसके बाद इसके उत्तराखंड में तब्दील हो जाने के बाद भी क्रिकेट के हालात नहीं बदले। क्रिकेट से जुड़ी दो-तीन एसोसिएशनों का उदय हुआ, लेकिन मान्यता की हरी झंडी किसी को नहीं मिली, लिहाजा आज भी हालात जस-के-तस हैं।
अगर निजी एकेडमियों में जाने के लिए पैसा नहीं तो फिर मन मारकर रह जाना पड़ेगा। आयोजनों केनाम पर जिला क्रिकेट लीग होती रही है। पर इससे खिलाड़ियों को कोई फायदा नहीं हो रहा।
कोच रविंद्र नेगी सवाल उठाते हैं कि क्रिकेट के लिए सरकार को बेहतरीन ग्राउंड मुहैया कराना चाहिए, लेकिन यहां आइस रिंक बनाने को सरकार के पास है, खिलाड़ियों के लिए मूलभूत सुविधाएं जुटाने को नहीं। फिलहाल वह बाट जोह रहे हैं कि कब उनकी सुनी जाएगी।