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पढ़िए तीन खिलाड़ी बहनों की दर्दनाक दास्तां

Fri, 27 Jun 2014 08:54 PM IST
हरेंद्र रापरिया/अमर उजाला, पानीपत
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‘अगर मैं अपनी बेटियों को खेल के क्षेत्र में न लाता तो शायद आज ये दिन नहीं देखने पड़ते।, हरियाणा के जिले पानीपत के गांव दीवाना निवासी वेद सिंह ने अमर उजाला से बातों-बातों में ही अपने दिल की पीड़ा को बयां कर दिया।
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बकौल वेद सिंह, 'बेटियों को खिलाड़ी बनाते-बनाते मेरी वर्कशाप तक बिक गई। परिवार के गुजर बसर के लिए अब टैक्सी पर ड्राइवरी करनी पड़ रही है। नई खेल नीति का ढोल पीटने वाली सरकार और उसके प्रतिनिधि हमारी बात तक सुनने को तैयार नहीं।

आलम यह है कि अंतरराष्ट्रीय व राष्ट्रीय ताइक्वांडो प्रतियोगिताओं में 90 मेडल जीतने के बाद भी तीनों बेटियां रोजगार को मोहताज हैं। सरकार अगर बेटियों के खेल के आधार पर रोजगार दे देती तो शायद वे और अच्छा प्रदर्शन कर देश का नाम रोशन करतीं।'
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राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खेलों से बनाई पहचान

वेद सिंह की बेटी सुमन ने बताया कि वह कई साल से खेल रही हैं मगर 2008 में दक्षिण कोरिया में ताइक्वांडो का प्रशिक्षण लेने के बाद उसका खेल निखरता चला गया। प्रशिक्षण के बूते उसने सितंबर-2009 में दक्षिण कोरिया में आयोजित अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में देश के लिए कांस्य पदक जीता।

इस पदक समेत विभिन्न राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में वह 25 पदक जीत चुकी है। स्नातक करने के बाद बीपीएड भी की। मगर सरकार ने कोई सुध नहीं ली। उसकी मंझली बहन पूजा ने 2008 में बुसान (दक्षिण कोरिया) में रजत पदक जीतकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।

दक्षिण कोरिया में आयोजित प्रशिक्षण शिविर में कठोर प्रशिक्षण पाने के बाद उसने कई राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक जीते। वह अब तक 33 पदक जीत चुकी है। उसने भी बहन सुमन के साथ बीपीएड किया। पिता ने बड़ी बहन के साथ ही एक मंडप में दो अप्रैल-2014 में उसकी भी शादी कर दी। इसके बावजूद दोनों बहनें अभ्यास से खेल को निखार रही हैं।

चार हजार से अधिक लड़कियों को दे चुकी हैं ट्रेनिंग

अपनी बहनों की देखादेखी सबसे छोटी बहन सोनिया भी इस खेल में आ गई। राष्ट्रीय प्रतियोगिता में शानदार खेल दिखाने के बाद उसे 2009 में अमेरिका तथा उज्बेकिस्तान में प्रशिक्षण लेने का मौका मिला।

इसी के बूते 2010 में इटली में आयोजित कोमबेट लीग वर्ल्ड कप में उसने रजत पदक जीता। वह अब तक 32 पदक झटक चुकी है। वह बीए द्वितीय वर्ष की छात्रा है और उसे उम्मीद है कि वह एक दिन देश का नाम रोशन करेगी।

वर्ष 2013 में प्रदेशभर में आत्मरक्षा के लिए अभियान चलाकर तीनों बहनें पंचकूला, अंबाला, कुरुक्षेत्र, करनाल, पानीपत, सोनीपत और रोहतक में चार हजार से अधिक लड़कियों को ट्रेनिंग दे चुकी हैं। इसके अलावा तीनों बहनें पानीपत के 22 स्कूलों में हजारों लड़कियों को भी आत्मरक्षा के लिए ट्रेनिंग दे चुकी हैं।
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सम्मान से पेट नहीं भरता, चाहिए नौकरी

बहनों से प्रेरणा लेकर उनका छोटा भाई भोपाल सिंह ताइक्वांडो खेलने लगा। बहनों से गुर सीखकर राष्ट्रीय व राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में दर्जनभर पदक जीत चुका है। उसका सपना भी बहनों की तरह अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में पदक जीतना है।

वेद सिंह का कहना है कि बेटियों को खिलाड़ी बनाने में उसने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया। कभी देश तो कभी विदेश भेजने में उसकी सारी जमा पूंजी खत्म हो गई। फिर भी उसने सोचा कि लड़कियों का कैरियर बनाया जाए वही उसके लिए सबसे बड़ी पूंजी होगी।

उसकी लड़कियां मुख्यमंत्री और राज्यपाल के हाथों कई बार सम्मानित हो चुकी हैं मगर सम्मान से पेट नहीं भरता। कैरियर को बचाने के लिए लड़कियों को सरकारी नौकरी की सख्त जरूरत है। इसके लिए वे अधिकारियों से लेकर नेताओं के सामने गुहार लगा चुके हैं मगर कोई फायदा नहीं हुआ।
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