एक सीट, चार सवारी और 36 घंटे से अधिक का सफर। आंध्र प्रदेश के वारंगल में नेशनल स्कूल खो-खो में प्रतिभाग के लिए शिक्षा विभाग की खो-खो टीम में शामिल छात्र-छात्राएं रविवार रात कुछ इस तरह रविवार रात दून से रवाना हुए।
टिकट कन्फर्म नहीं करा सका शिक्षा विभाग
टीम से मेडल की उम्मीदें लगाए शिक्षा विभाग 24 सदस्यों के टिकट कन्फर्म नहीं करा सका। ऐसे में हजारों किलोमीटर की यात्रा सिर्फ बैठे रहकर पूरा करने की मजबूरी के बीच इन खिलाड़ियों का मेडल कैसे कन्फर्म होगा, यह बड़ा सवाल है।
खास बात यह है कि यह पहला मौका नहीं है, जब विभाग ने खिलाड़ियों को इस तरह नेशनल गेम्स में भेजा हो। राष्ट्रीय विद्यालयी खो-खो प्रतियोगिता के लिए रविवार रात पौने दस बजे उत्तराखंड की बालक-बालिका टीमें मसूरी एक्सप्रेस से आंध्र प्रदेश के लिए रवाना हुईं।
टीमों को सात अक्तूबर को वारंगल में रिपोर्ट करना है। अमर उजाला टीम की रवानगी से पहले रेलवे स्टेशन पहुंचा तो खिलाड़ियों ने बताया कि वे दून से पहले दिल्ली और फिर वहां से दूसरी ट्रेन में आंध्र प्रदेश के लिए निकलेंगे। वारंगल तक ट्रेन से जाने के बाद आगे कुछ किलोमीटर का सफर बस से पूरा होगा।
इस बीच सीट मिलने के सवाल पर खिलाड़ियों ने चुप्पी साध ली। अमर उजाला ने कोच के भीतर जायजा लिया तो एक-एक सीट पर चार-चार बालिकाएं बैठी नजर आईं। पूछा तो मालूम हुआ कि टिकट कन्फर्म नहीं हुआ था। दूसरे कोच में बालक खिलाड़ी गैलरी में रखे बैगों पर बैठे नजर आए।
हालांकि, खिलाड़ियों के चेहरों पर नेशनल गेम्स में जाने का उत्साह दिखा, लेकिन अमर उजाला ने जब सफर में थकान के बारे में पूछा तो दबी जुबान में वे बोले जाना तो है ही, एडजस्ट तो करना ही पड़ेगा।
पिछली गलती से नहीं लिया सबक
शिक्षा विभाग ने गत वर्ष एथलेटिक टीम को झारखंड भेजा था। उस वक्त भी खिलाड़ियों के टिकट समय से कन्फर्म नहीं किए जा सके थे। खिलाड़ियों को सीटों पर ठुंस-ठुंसकर जाना पड़ा था, जिसका असर नेशनल स्कूली एथलेटिक्स में उनके प्रदर्शन पर भी नजर आया। तब टीम सिर्फ एक पदक जीत सकी थी।
सुबह भी एक टीम भेजी थी, जिसके टिकट कन्फर्म हो गए थे। खो-खो टीम के टिकट नहीं हो सके। राज्य स्तरीय प्रतियोगिता और नेशनल के बीच 20-25 दिन का वक्त रहता है।
- गीता नौटियाल, राज्य खेल समन्वयक, शिक्षा विभाग