खेल और खिलाड़ियों के प्रोत्साहन के दावों की हकीकत परखनी हो तो इन दिनों देहरादून के परेड ग्राउंड का चक्कर लगा लें।
आप भी जान जाएंगे कि उत्तराखंड में खेल से ज्यादा सरकार खिलाड़ियों से ‘खेल’ रही है। बेहतर भविष्य के सपने संजोए राज्य के लिए स्टेट और नेशनल लेवल तक दांव लड़ा चुके खिलाड़ी पंडिताई कर परिवार चलाने को मजबूर हैं या फिर बेहद कम मानदेय पर निजी स्कूलों में एड़ियां घिस रहे हैं।
कई बीपीएड बेरोजगार 40 की उम्र पार कर चुके हैं, लेकिन आज भी नौकरी की आस है। सभी कई दिनों से परेड ग्राउंड में धरना दे रहे हैं। इनमें कुछ 250 किमी दूर चमोली के हैं तो कुछ बेरोजगार 550 किमी दूर पिथौरागढ़ से यहां आए हैं।
उनका कहना है कि आठ वर्षों से राज्य में व्यायाम शिक्षकों की नियुक्तियां नहीं हुई हैं, जिससे हजारों बेरोजगार आयुसीमा पार कर चुके हैं। मगर सरकार की दया दृष्टि अब तक नहीं पड़ी।
नेशनल खेलकर भी नहीं मिली नौकरी
चमोली जिले के नैनीनोटी गांव निवासी 44 वर्षीय दिगंबर प्रसाद कैलकुरी की नौकरी की उम्र पार हो चुकी है। ढाई सौ किलोमीटर दूर से दून पहुंचे कैलकुरी के अनुसार वर्ष 2007 में बीपीएड किया, लेकिन तब से व्यायाम शिक्षकों की नियुक्तियां नहीं निकलीं।
परिवार में दो बच्चे हैं। बेटी स्वाति इंटर और बेटा प्रफुल्ल आठवीं में है। नौकरी नहीं मिली तो पंडिताई कर परिवार चला रहे हैं। अब आंदोलन से आस है कि सरकार शायद उनके बारे में कुछ करे।
कोटद्वार निवासी सतपाल असवाल हॉकी खिलाड़ी हैं। वर्ष 2001 में वह ओएनजीसी में आयोजित राज्य स्तरीय हॉकी और पहले गढ़वाल यूनिवर्सिटी और जामिया यूनिवर्सिटी से नॉर्थ जोन के लिए खेल चुके हैं।
तीन भाई-बहनों में छोटे सतपाल बताते हैं कि 57 वर्षीय पिता ध्यान सिंह बस चलाते थे। सात साल पहले वे भी नौकरी छोड़ चुके हैं। सतपाल को मजबूरन बेहद कम मानदेय में निजी स्कूल की नौकरी करनी पड़ रही है।
पथरीबाग, देहरादून निवासी प्रीति बिष्ट पांच भाई-बहनों में सबसे छोटी हैं। वर्ष 2008 में बीपीएड किया, लेकिन छह साल बाद भी नौकरी नहीं मिली। बताती हैं, -‘पिता आरएस बिष्ट रेलवे से रिटायर हैं। उनकी पेंशन से परिवार चल रहा है।
सरकार स्थाई नियुक्ति नहीं दे सकती तो हमें संविदा पर लगाए। वहीं, नमृता बोरा राज्य स्तरीय पुरस्कार तीलू रौतेली पुरस्कार से सम्मानित हैं। वर्ष 2012 में उन्हें यह सम्मान मिला। मगर नौकरी के लिए आज तक भटक रही हैं।