इरादे बुलंद हों तो कामयाबी की राह में कोई बाधा नहीं आ सकती। कुदरत ने भले ही विकलांगता का दंश दिया हो, लेकिन दून के कुछ युवाओं ने अपनी कमी को ही हथियार बना लक्ष्य साधने का तरीका सीख लिया है।
राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान हासिल कर रहे ये युवा अपने जैसे ही नहीं, सामान्य युवाओं के लिए भी मिसाल बनकर उभरे हैं। रविवार को पर्वतीय विकलांग सेवा संस्थान ने ऐसे ही कुछ युवाओं को सम्मानित किया।
दिलराज का निशाना अचूक
हाथीबड़कला निवासी दिलराज कौर का बायां हाथ और शरीर का बायां हिस्सा पैदाइशी काम नहीं करता। लेकिन निशक्त होने के बावजूद दिलराज अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज हैं।
व्हील चेयर पर बैठकर बंदूक उठाने वाली दिलराज का निशाना कभी चूकता नहीं। वर्ष 2007 में उन्होंने ताइवान में गोल्ड और वर्ष 2009 में रजत पदक जीता था।
पोलियो को हरा पैरों पर खड़े हुए चंचल
लक्खीबाग निवासी चंचल को दो वर्ष की उम्र में पोलियो हो गया था। इसके चलते वह पैरों पर खड़े नहीं हो सकते, लेकिन चंचल ने कभी खुद को परिवार पर बोझ नहीं बनने दिया।
घर पर बैठे रहने के बजाय चंचल ने हाईस्कूल तक पढ़ाई पूरी की और इसके बाद इलेक्ट्रानिक्स का काम सीख खुद की दुकान शुरू की। इन दिनों वह एक निजी कंपनी में कार्यरत हैं।
खुदमुख्तार सुंदर ने दूसरों को भी दिया रोजगार
सहसपुर निवासी सुंदर थापा के पैर जन्म से ही मुड़े हुए थे। वह ठीक से चल नहीं सकते, लेकिन यह कमी कभी उनकी राह रोक नहीं सकी। सुंदर ने स्वरोजगार को अपनाया।
घर पर ही डेयरी शुरू की, जहां तीन लोगों को उन्होंने रोजगार भी दिया है। सुंदर बताते हैं कि डेयरी से उन्हें प्रतिमाह 25 हजार की कमाई होती है। यही नहीं, सुंदर अपने गांव के प्रधान भी रह चुके हैं।
हाथ बिना सोने पर निशाना लगाते हैं विशाल
रायपुर रोड निवासी विशाल बचपन में बम को गेंद समझ खेलने लगे थे। बिजनौर में वर्ष 1990 में हुए उस हादसे ने उनके दोनों हाथ छीन लिए।
अब हाथों के नाम पर उनका कंधे से कोहनी तक का हिस्सा ही बचा है। लेकिन विशाल इनकी मदद से ही निशानेबाजी में कामयाबी हासिल कर रहे हैं। हाल ही में उन्होंने राष्ट्रीय निशानेबाजी में गोल्ड मेडल जीता है।