कहने को तो यह उत्तराखंड युवा कल्याण विभाग की राज्य स्तरीय बैडमिंटन प्रतियोगिता थी, लेकिन न यहां रेफरी थे और न ही लाइनमैन।
गलतियां होने पर कई बार हुआ विवाद
आलम यह रहा कि खिलाड़ी ही खुद पहले रेफरी बनकर दूसरे मुकाबलों का निर्णय देते रहे, फिर अपना मैच खेलने मैदान में उतरते रहे। इस दौरान निर्णयों में कई बार गलतियां होने पर विवाद की स्थिति भी बनती रही।
दून के परेड ग्राउंड स्थित बहुउद्देश्यीय क्रीड़ा हॉल में राजीव गांधी खेल अभियान योजना के तहत अंडर-16 बालक-बालिका वर्ग की प्रतियोगिता के अंतिम दिन रविवार को टीम चयन ट्रायल के मुकाबले खेले गए। हॉल में बने तीनों कोर्ट पर सुबह से शाम तक खिलाड़ी ही रेफरी बने बैठे नजर आए।
यह हाल तब है, जबकि नवंबर में ही उत्तराखंड के 15 खिलाड़ियों ने रेफरी टेस्ट पास किया था, जिनमें से 12 देहरादून के ही हैं। उत्तराखंड स्टेट बैडमिंटन एसोसिएशन इन्हें प्रतियोगिताओं के लिए अधिकृत भी कर चुका है। इसके बावजूद युवा कल्याण एवं प्रांतीय रक्षक दल विभाग ने इन रेफरियों को नहीं बुलाया।
आयोजन समिति के प्रभारी बीएस रावत ने कहा कि इसकी जिम्मेदारी जिला खेल विभाग के कोच दीपक रावत को दी गई थी। कहा कि खिलाड़ियों को रेफरी बनाए जाने की कोई जानकारी नहीं है।