हिन्दू धर्म में जन्म से लेकर मृत्यु तक कुल 16 संस्कार बनाए गए हैं। इनमें एक संस्कार का नाम है गर्भाधान संस्कार यानी गर्भ धारण करने का संस्कार।
प्राचीन काल में इस संस्कार का बड़ा महत्व था। पति-पत्नी किसी ज्ञानी ज्योतिषी से दिन और मुहूर्त पूछकर संतान प्राप्ति की इच्छा से भगवान का ध्यान करके संसर्ग करते थे।
गर्भाधान का नियम क्यों
इस संस्कार का उद्देश्य यह था कि व्यक्ति काम वासना में लिप्त नहीं हो। व्यक्ति संसर्ग तभी करे जब संतान प्राप्ति की इच्छा हो। संसार के सभी जीव तभी आपस में मिलते हैं जब संतान की कामना होती है, मानव भी इस नियम का पालन करे।
इसलिए भी जरुरी है गर्भाधान संस्कार
इस संस्कार का दूसरा उद्देश्य यह भी था कि संतान सुयोग्य और गुणवान पैदा हो। ज्योतिषशास्त्र में कहा गया है कि शुभ मुहूर्त में गर्भ धारण करने से गुणवान और योग्य संतान की प्राप्ति होती है।
कुसमय में संसर्ग से उत्पन्न व्यक्ति
इसके विपरीत कुसमय में संसर्ग और काम वासना से प्रेरित होकर गर्भ धारण होने से संतान की बुद्घि मलिन होती है। यह अपने माता-पिता और कुल परंपरा को नुकसान पहुंचाते हैं। इनके व्यवहार से परिवार की बदनामी होती है।
शास्त्रों में कई ऐसी कथाएं हैं जिनमें बताया गया है कि कुसमय में संसर्ग करने से उत्पन्न संतान से कुल को अपमानित किया। रावण के जन्म से जुड़ी कथा भी इसी तरह की है। कथा है कि रावण की माता ने कैकसी ने कुसमय में गर्भधारण करने की इच्छा प्रकट की।
रावण के पिता विश्वश्रवा के मना करने पर भी जब रावण की माता नहीं मानी तो विश्वश्रवा को कैकसी की इच्छा पूरी करनी पड़ी। गर्भधारण के समय ही विश्वश्रवा ने कैकसी से कह दिया था कि तुम्हारा पुत्र कुल को कलंक लगाने वाला होगा।