मालदीव में पूर्व तानाशाह अब्दुल गयूम के चचेरे भाई अब्दुल्ला यामीन का चुनाव जीतकर राष्ट्रपति बनना चौंकाने वाला तो है ही, यह लोकतांत्रिक विश्व के लिए निराशाजनक भी है, जो नाशीद को इस पद पर देखना चाहते थे। तीन दशकों की तानाशाही को ध्वस्त कर जो व्यक्ति वहां लोकतांत्रिक उदारवाद के प्रतीक के रूप में उभरा था, और इस बार भी शुरुआती चुनाव में जिसे सर्वाधिक वोट मिले थे, उसे आखिरी दौर में अचानक हार का मुंह देखना पड़ा।
चूक दरअसल नाशीद से भी हुई है। देश में कट्टरवाद अचानक जिस तेजी से बढ़ने लगा, उन्होंने न सिर्फ उसकी अनदेखी की, बल्कि इसका भी हिसाब नहीं लगाया कि ऐसे माहौल में भारत पर अति निर्भरता उनका नुकसान कर सकती है।
उन्होंने राजनीतिक दलों के साथ गठजोड़ बनाने की भी कोशिश नहीं की। नतीजा यह कि 2008 के चुनाव में जो पार्टियां उनके साथ थीं, इस बार वे यामीन की पीपीएम (प्रोग्रेसिव पार्टी ऑफ मालदीव) के साथ हो गईं।
चूंकि मालदीव पर जल्दी सरकार गठन का अंतरराष्ट्रीय दबाव बनने लगा था। ऐसे में, आखिरी दौर के चुनाव में जहां ज्यादा से ज्यादा मतदान कराने पर जोर दिया गया, वहीं यामीन ने मतदाताओं के बीच खुद की छवि इस्लाम के एक ऐसे संरक्षक के तौर पर पेश की, जिसके नेतृत्व में मालदीव एक मजबूत राष्ट्र बन सकता है।
यानी एक तरफ अकेले नाशीद खुद को विजयी मान रहे थे, दूसरी ओर, तमाम पार्टियां एकजुट होकर उनका खेल बिगाड़ने पर तुली हुई थीं। तीसरे नंबर पर रही जिस जम्हूरी पार्टी ने यामीन को अपना समर्थन दिया, उसके प्रमुख न सिर्फ अब्दुल गयूम के काफी करीबी माने जाते हैं, बल्कि इसके ब्योरे हैं कि सौदेबाजी के तहत यामीन ने तैंतीस प्रतिशत सरकारी पदों पर जम्हूरी पार्टी के कार्यकर्ताओं की नियुक्ति का भरोसा दिलाया है।
इसी तरह, भारतीय कंपनी जीएमआर को मालदीव से बाहर करने में जिस शख्स की केंद्रीय भूमिका थी, वह नए उपराष्ट्रपति होंगे। हालांकि अब्दुल्ला यामीन पिछले दिनों भारत का दौरा कर चुके हैं, लेकिन यह समझना मुश्किल नहीं है कि पांच साल पहले जो मालदीव तानाशाही के लंबे दौर से बाहर निकला था, वह अब कट्टरवाद के दुश्चक्र में फंसने को अभिशप्त है।