बाली में विश्व व्यापार संगठन की मंत्रिस्तरीय बैठक में भारत ने अमेरिका और यूरोपीय संघ का विरोध कर गलत नहीं किया है। खाद्य सुरक्षा सिर्फ भारत के लिए नहीं, दुनिया के करीब चार अरब लोगों के अस्तित्व के लिए आवश्यक है।
विकासशील देशों की न सिर्फ आबादी ज्यादा है, बल्कि महंगे अनाज का आयात भी यहां की सरकारों के लिए संभव नहीं। लेकिन बाली में मौजूद ऐसे करीब तैंतीस देशों की, जिनमें दक्षिण अमेरिकी, अफ्रीकी और एशियाई मुल्क भी हैं, समेवत आवाज को सिर्फ भारत का विरोध बताकर अमेरिका और यूरोपीय संघ विकासशील देशों की एकजुटता को कमतर करके आंक रहे हैं।
एकाधिक विकसित देश अपने किसानों को सौ फीसदी सब्सिडी देते हैं। दूसरे देशों के बाजार में घुस जाने वाले ये मुल्क अपने बाजारों में विकासशील देशों के प्रवेश पर उल्टी-सीधी शर्तें थोपते हैं। वही मुल्क आज बाली में कुल अनाज उत्पादन की दस प्रतिशत सब्सिडी किसानों को देने की अन्यायपूर्ण शर्त थोप रहे हैं।
व्यापार से लेकर पर्यावरण के विश्व मंचों पर ताकतवर देशों की यह दादागीरी नई नहीं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम बाली से खाली हाथ लौट आएं। हमें खाद्य सुरक्षा भी चाहिए और विश्व व्यापार संगठन का साथ भी। हाल के दशकों में हमारी आर्थिक समृद्धि सिर्फ खेती से नहीं आई है, भूमंडलीकृत व्यवस्था में दूसरे देशों के साथ व्यापार से भी आई है, जिसकी राह सीमा शुल्क समेत तमाम करों में कटौतियों से आसान हुई है। यह ठीक है कि हमारी संसद से पारित खाद्य सुरक्षा कानून पर किसी बाहरी देश को उंगली उठाने का हक नहीं है। पर घटती कृषि भूमि व महंगे होते खाद्यान्न के इस कठिन दौर में करीब अस्सी करोड़ लोगों को रियायती दर पर खाद्यान्न मुहैया कराने की योजना का विश्व स्तर पर अनाज की उपलब्धता और कीमत पर असर नहीं पड़ेगा, यह मानना भ्रम है।
यह भी ध्यान में रखना होगा कि चीन ने विकसित देशों के विरोध के बजाय बीच का रास्ता चुना है और इंडोनेशिया भी उनके पाले में चला गया है। ऐसे में, हमें संतुलन बनाकर चलना चाहिए। विकासशील देशों के हक की आवाज उठाना तो ठीक है, लेकिन बाली की बैठक अगर विफल रहती है, तो उसका ठीकरा हमारे ही सिर फूटना है।