पाकिस्तान का चुनावी नतीजा दो वजहों से दुनिया भर के लोकतंत्रकामियों के लिए शुभ है। एक तो आतंकवादी धमकियों और चुनावी हिंसा के बावजूद वहां मतदाता घर से निकले; साठ प्रतिशत के आसपास हुआ मतदान इसका संतोषजनक प्रमाण है।
इसके अलावा पहली बार पांच साल चले लोकतंत्र को आगे बढ़ाने के लिए मतदाताओं ने एक ऐसी पार्टी की जीत सुनिश्चित की, जो भारत के साथ दोस्ती में यकीन करती है। हालांकि पीएमएल (एन) अपने मूल चरित्र में कट्टरवादी पार्टी ही है, इसलिए चुनावी नतीजे को उदारवाद की जीत नहीं कह सकते।
इसके बावजूद नवाज शरीफ का प्रदर्शन इसलिए उल्लेखनीय है कि उनके अपने प्रांत पंजाब में इमरान खान न सिर्फ मजबूत प्रतिद्वंद्वी के रूप में सामने थे, बल्कि कट्टरवादी वोटों की लड़ाई में भी वह पूर्व क्रिकेटर पर भारी पड़े।
चुनाव से पहले नवाज शरीफ ने अपनी यह प्रतिबद्धता दोहराई थी कि सत्ता में आने पर वह भारत के साथ रिश्ते को 1999 से आगे ले जाएंगे। उनका सत्ता में आना भारत के लिए जितना भी सुखद हो, लेकिन पाकिस्तान में लोकतंत्र के स्थायित्व में यह कितना कारगर होगा, कहना कठिन है, क्योंकि सेना से उनके छत्तीस के रिश्ते जग-जाहिर हैं।
प्रधानमंत्री के सर्वोच्च होने की नवाज शरीफ की टिप्पणी और चुनावी नतीजे पर जेल में बंद पूर्व तानाशाह परवेज मुशर्रफ की क्षुब्ध प्रतिक्रिया अभी से नई सरकार और ताकतवर सेना के बीच संभावित रिश्तों के बारे में बहुत कुछ बता देती है।
नवाज शरीफ से वैसी क्रांति की उम्मीद बेशक नहीं कर सकते, जिसके ख्वाब इमरान खान ने दिखाए थे, लेकिन चरमराती बुनियाद और अस्त-व्यस्त अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए उन्हें ठोस कदम तो उठाने ही होंगे। जब अमेरिका के साथ पाकिस्तान के रिश्ते उतने गहरे नहीं हैं, तब बाहर से आर्थिक मदद बहुत आसान नहीं होगी।
अलबत्ता नवाज शरीफ की सबसे कठिन परीक्षा अगले साल तब होगी, जब अफगानिस्तान से विदेशी सैनिक पूरी तरह विदा हो जाएंगे। तब वह तहरीक-ए-तालिबान जैसे आतंकी संगठनों पर अंकुश लगा पाएंगे या नहीं, यह देखने वाली बात होगी। एक पड़ोसी के तौर पर भारत की उम्मीद तो यही है कि वहां लोकतांत्रिक व्यवस्था बनी रहे।