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अध्यादेश की इतनी जल्दी

Wed, 25 Sep 2013 07:42 PM IST
नई दिल्ली
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संप्रग सरकार के बारे में बीते कुछ वर्षों में यह धारणा बनती गई है कि वह नीतिगत पंगुता का शिकार है और फैसले देर से लेती है। मगर दूसरा पहलू यह भी है कि वह अपने सियासी हितों को लेकर इतनी सचेत है कि जिन कानूनों को वह संसद में पारित नहीं करवा सकती, उसे अध्यादेश के जरिये लाने से गुरेज नहीं करती। खाद्य सुरक्षा अध्यादेश के बाद आपराधिक मामलों में दोषी ठहराए गए सांसदों और विधायकों की सदस्यता बरकरार रखने के लिए लाया जाने वाला अध्यादेश इसी राजनीति की अगली कड़ी है।
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सर्वोच्च अदालत ने 10 जुलाई के अपने फैसले में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के अनुच्छेद 8 (4) के उन प्रावधानों को असांविधानिक बताकर निरस्त कर दिया था, जिसमें आपराधिक मामलों में दोषी ठहराए गए सांसद या विधायक दो वर्ष से अधिक की सजा मिलने की स्थिति में ऊपरी अदालत में अपील कर अपनी सदस्यता बचाए रख सकते थे। बेशक यह आशंका सही है कि सिर्फ निचली अदालतों के आधार पर दोषी ठहराए जाने पर एक-दो सांसदों या विधायकों की सदस्यता रद्द हो जाए, तो सरकारें अस्थिर हो सकती हैं। लेकिन जैसा कि सर्वोच्च अदालत ने उसी फैसले में कहा है, यदि आपराधिक मामलों में दोषी ठहराए गए लोग चुनाव नहीं लड़ सकते, तो फिर दोषी ठहराए गए व्यक्ति सांसद या विधायक कैसे बने रह सकते हैं!

राजनीति को आज भी अपराधीकरण से मुक्त नहीं किया जा सका है, तो इसकी वजह यह अंतर भी है। उल्लेखनीय है कि आज भी 163 सांसद ऐसे हैं, जिनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं! सरकार की बेचैनी कदाचित इसलिए है कि सर्वोच्च अदालत के फैसले की गाज सबसे पहले उसी पर गिरती दिख रही है। इसी फैसले के कारण हाल ही में एक मामले में दोषी ठहराए गए कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य राशिद मसूद की सदस्यता जा सकती है; तो कांग्रेस के सहयोगी लालू प्रसाद यादव की सदस्यता भी खतरे में है। मगर इसका यह मतलब नहीं है कि दूसरे दल दागियों को अयोग्य करार दिए जाने के पक्ष में हैं। असल में तमाम राजनीतिक दलों ने सर्वोच्च अदालत के फैसले को विधायिका और कार्यपालिका के क्षेत्र में दखल के रूप में ही देखा है और सरकार के उनके विरोध की वजह नैतिक कम, राजनीतिक अधिक लगती है।
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