कई बार बेहतर बदलाव के लिए शुरू की जाने वाली दूरगामी योजना भी अंदरूनी विरोध के कारण किस तरह सिरे नहीं चढ़ पाती, 'प्राइमरी' का हश्र इसका ज्वलंत उदाहरण है।
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में राहुल गांधी ने लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी खड़े करने के लिए जब अमेरिका की प्राइमरी व्यवस्था को प्रयोग के तौर पर लागू करने की घोषणा की थी, तब उसका स्वागत हुआ था।
चूंकि पार्टियों की हार के पीछे कई बार टिकट वितरण में होने वाली चूक का मामला सामने आता है; राहुल गांधी को इसका कटु अनुभव भी है, इसीलिए उन्होंने इस व्यवस्था को लागू करने की सोची, जिसमें प्रत्याशियों के चयन में जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं को भी अपनी राय रखने का हक मिलता है।
इसीलिए कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों ने भी इसका दिल खोलकर स्वागत किया। पर जब इस पर अमल की बात आई, तब विरोध के स्वर सामने आने लगे। पहले दिल्ली की दो सीटों को प्राइमरी के तौर पर चुने जाने का विरोध हुआ, तो बाद में जिन दो सीटों को इसके लिए चुना गया, वहां के मौजूदा सांसद वोटिंग में आराम से जीत गए।
महाराष्ट्र में औरंगाबाद, धुले और यवतमाल में से किन्हीं दो को प्राइमरी के तहत लाने की योजना थी, पर विरोध के कारण वर्धा और लातूर को चुना गया, लेकिन वहां भी पार्टी के उम्मीदवार यथावत रहे। उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर में वोटिंग में जीते प्रत्याशी पर वोट खरीदने के आरोप लगे, तो अंबेडकरनगर सीट पर भी विवाद हुआ।
बेनी प्रसाद वर्मा ने तो खुलेआम यह कहा कि उत्तर प्रदेश में प्राइमरी व्यवस्था नहीं चल सकती। मध्य प्रदेश की मंदसौर सीट पर मीनाक्षी नटराजन की दावेदारी बरकरार रहना उतना आश्चर्यजनक नहीं है, जितना चौंकाने वाला यह आरोप है कि उन्हें गलत तरीके से जिताया गया।
राजस्थान के झुंझनू में प्राइमरी का यह कहकर कांग्रेसियों ने ही विरोध किया कि यहां तो शीशराम ओला के परिजन को सीधे टिकट देना चाहिए। इस तर्क में दम हो सकता है कि प्राइमरी के लिए सीटों का चयन सही नहीं था, उन सीटों पर ध्यान देना चाहिए था, जहां पार्टी कमजोर है।
लेकिन चुनी गई सीटों में से एक में भी नए प्रत्याशी का नाम न आना बताता है कि बदलाव की यह कोशिश शुरुआत में ही किस तरह दम तोड़ गई।