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अब यहां से कहां जाएंगे

Fri, 31 May 2013 08:45 PM IST
दिल्ली
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जब यूपीए सरकार के चुनावी विज्ञापन देश के चहुंमुखी विकास के लंबे-चौड़े दावे कर रहे हैं, तब देश की आर्थिक विकास दर का दशक भर के निचले स्तर पर आ जाना केवल हमारे नीति-नियंताओं के कामकाज पर ही सवाल नहीं है, बल्कि उनकी आगामी चुनावी संभावनाओं पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न है।
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यह बहुत प्रासंगिक सवाल है कि जब पिछले साल की आर्थिक विकास दर घटकर पांच फीसदी रह गई है, तो हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री विदेशी निवेशकों को आठ फीसदी का भरोसा किस आधार पर दिला रहे हैं। अपनी आर्थिक दुरावस्था के लिए तो अब वैश्विक मंदी का बहाना भी नहीं चलने वाला।

मंदी से हमारा निर्यात क्षेत्र जरूर प्रभावित हुआ है; बाहरी मांग के अभाव में औद्योगिक उत्पादन पर असर पड़ा है। लेकिन राजनीतिक गतिरोध के कारण रुके हुए आर्थिक फैसलों और मौद्रिक नीतियों के मोर्चे पर व्याप्त अदूरदर्शिता का वैश्विक मंदी से कोई लेना-देना नहीं है।
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जब देश की अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए दूरदृष्टि की जरूरत थी, तब आर्थिक नीतियों पर सरकार के भीतर न सिर्फ दो धाराएं देखी गईं, बल्कि कदाचित पहली बार मौद्रिक नीतियों के मामले में रिजर्व बैंक के रवैये के प्रति सरकार की अहसमति भी देखी गई।

ब्याज दर घटाकर बाजार में नकदी का प्रवाह बढ़ाने का काम केंद्रीय बैंक का जरूर है, लेकिन इसके लिए जरूरी माहौल तो सरकार को ही बनाना होता है। पिछले साल खराब मानसून के कारण कृषि क्षेत्र की विकास दर दो फीसदी से भी नीचे चली गई और मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाने में सरकार सफल नहीं हो पाई। घटते निर्यात के बीच कच्चे तेल और सोने का आयात इतना बढ़ा कि चालू खाते का घाटा बढ़ गया।

ऐसे में केंद्रीय बैंक से आप ब्याज दर घटाने की उम्मीद नहीं कर सकते। तिस पर भ्रष्टाचार के लगातार खुलासों ने माहौल इतना खराब कर दिया कि विदेशी निवेश आना तो दूर, यहां के निवेशकों ने बाहर निवेश करना बेहतर समझा। करीब दस साल पहले इंडिया शाइनिंग के नारों के बावजूद राजग सत्ता में नहीं आ पाया था, तो इसकी वजह महज चार फीसदी की उसकी आर्थिक विकास दर भी थी।

हालांकि यूपीए सरकार ने अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए देर से ही सही, कुछ कदम उठाए हैं। पर इन सबका लाभ तभी मिल पाएगा, जब कृषि क्षेत्र को गति देने और महंगाई व भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की दिशा में ठोस उपाय किए जाएं।
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