हमारे जनप्रतिनिधियों को संसद की मर्यादाओं और दलीय पारदर्शिता से ज्यादा अपने हितों की कितनी चिंता है, यह मानसून सत्र से पहले हुई सर्वदलीय बैठक में फिर साफ हुई है। सिर्फ यही नहीं कि शीर्ष अदालत के दो हालिया फैसलों को उन्होंने संसद की सर्वोच्चता पर अतिक्रमण बताया, बल्कि राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार कानून के दायरे में लाने की केंद्रीय सतर्कता आयोग की कवायद पर पानी फेरते हुए केंद्रीय कैबिनेट ने उस कानून में संशोधन को मंजूरी देकर तो हद ही कर दी।
शीर्ष अदालत की इस न्यायिक व्यवस्था से बेशक सहमत नहीं हुआ जा सकता कि जेल में बंद जो आदमी वोट देने का अधिकारी नहीं है, वह जनप्रतिनिधि बनने का हकदार नहीं हो सकता। जेल जाने वाले तमाम जनप्रतिनिधि आपराधिक प्रवृत्ति के होते हैं, यह नहीं मान सकते। आपातकाल के दौरान ज्यादातर विपक्षी नेताओं ने जेल से ही नामांकन पत्र भरा था, और चुनाव जीतने पर सरकार भी बनाई थी। लिहाजा न्यायालय के इस फैसले का इस हद तक दुरुपयोग हो सकता है, कि चुनाव से पहले कोई भी सरकार तमाम विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार कर उनकी राजनीतिक संभावनाओं पर पानी फेर सकती है।
अलबत्ता जनप्रतिनिधित्व कानून की उस धारा 8 (4) को निरस्त कर शीर्ष अदालत ने ठीक किया है, जिसमें दो साल से अधिक की सजा पाने वाला जनप्रतिनिधि तो चुनाव लड़ने के अयोग्य हो जाता है, पर पहले से सांसद या विधायक तीन महीने के भीतर अपील कर अपने पद पर बना रह सकता है।
संसद की सर्वोच्चता का हवाला देने वाले भूलते हैं कि संविधान की अनदेखी कर कोई कानून बनाया जाए, तो शीर्ष अदालत के पास उसकी समीक्षा का भी अधिकार है, और उसे निरस्त करने का भी। क्या विद्रूप है कि जनांदोलन के दबाव पर झुकते हुए जिस सरकार ने सूचना के अधिकार कानून को मंजूरी दी थी, और जिसे अब तक वह अपनी बड़ी उपलब्धि बता रही थी, उससे राजनीतिक दलों को बाहर करने के लिए कदम उठाने में उसे थोड़ी भी हिचक नहीं हुई।
जब राजनीति में काले धन का इस्तेमाल बढ़ा है, और चुनावों में आठ से सौ करोड़ रुपये तक खर्च करने के खुलासे सामने आ रहे हैं, तब खुद को पारदर्शिता से अलग रखने का यह दुराग्रह राजनीतिक दलों की छवि और खराब ही करेगा।