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जब पुलिस ही सुरक्षित नहीं

Fri, 14 Jun 2013 08:58 PM IST
नई दिल्ली
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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने एक वर्ष का कार्यकाल पूरा करने के बाद कहा था कि कानून और व्यवस्था उनकी सरकार की सबसे बड़ी चिंता है और उन्होंने पुलिस व्यवस्था को दुरुस्त करने का आश्वासन भी दिया था।
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मगर जिस तरह से बदमाशों ने दिन-दहाड़े इलाहाबाद के बारा थाना प्रभारी आरपी द्विवेदी को गोलियों से भून दिया, उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि सूबे की कानून-व्यवस्था किस तरह बेकाबू हो चुकी है। उस थाना प्रभारी का कुसूर बस यही था कि वह चोरी की कार से भाग रहे बदमाशों को पकड़ना चाहते थे।

सूबे में किसी पुलिस अफसर पर हमले की यह कोई पहली घटना नहीं है। कुछ महीने पहले ही इलाहाबाद से ही सटे प्रतापगढ़ जिले के कुंडा के डीएसपी जियाउल हक को भी मार डाला गया था, जब वह आपसी झगड़े में दो लोगों के मारे जाने के बाद तफ्तीश के लिए गए थे।
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जब राज्य में पुलिस अधिकारी ही सुरक्षित नहीं हैं, तब आम लोगों की स्थिति का सिर्फ अंदाजा ही लगाया जा सकता है? वाकई राज्य में आज कानून व्यवस्था सबसे बड़ी चुनौती बन गई है। खुद सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव अपने मुख्यमंत्री पुत्र को इसे लेकर कई बार हिदायत दे चुके हैं और यहां तक कह चुके हैं कि अगर वह मुख्यमंत्री होते, तो 15 दिन में पूरी व्यवस्था को दुरुस्त कर देते।

यह अच्छी बात है कि मुख्यमंत्री और सपा अध्यक्ष दोनों ही कानून-व्यवस्था को लेकर चिंतित हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर यह चिंता जिस रूप में दिखनी चाहिए, वह नहीं दिख रही है। इसके उलट कहीं न कहीं पुराने मुकदमे वापस लिए जाने जैसे कुछ ऐसे राजनीतिक फैसले लिए जा रहे हैं, जिससे पुलिस और कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालने वालों के हौसले कमजोर पड़ते हैं।

वास्तव में अखिलेश ने जब सूबे की कमान संभाली थी, तब उनसे यही अपेक्षा की गई थी कि वह पारंपरिक राजनीति से इतर राज्य को कुछ नया देंगे और कानून व्यवस्था को कमजोर करने वाले गठजोड़ को पनपने नहीं देंगे। असल में, सपा की पूर्व सरकारें कानून-व्यवस्था को लेकर ही बदनाम रही हैं।

अखिलेश ने पुलिस सुधार के साथ ही पुलिस के वाहनों में जीपीएस लगाने और थानों में सीसीटीवी वगैरह लगाने की बात कही है, इससे निश्चित ही पुलिस की कार्यक्षमता बढ़ेगी। मगर इसके साथ ही उन्हें मजबूत  राजनीतिक इच्छाशक्ति भी दिखानी होगी, ताकि लोगों का भरोसा कानून-व्यवस्था पर कायम हो सके।
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