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क्या- क्या करेंगे रघुराम राजन

Wed, 07 Aug 2013 08:44 PM IST
नई दिल्ली
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भारतीय रिजर्व बैंक के नए गवर्नर के रूप में गैर नौकरशाह, ऊर्जावान और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित कम उम्र अर्थशास्त्री रघुराम गोविंद राजन की नियुक्ति स्वागतयोग्य है, पर यह सोच बैठना भोलापन ही है कि उनके आने भर से भारतीय अर्थव्यवस्था मौजूदा संकट से निकल कर फर्राटे भरने लगेगी।
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इस आर्थिक गतिरोध के लिए वैश्विक परिस्थितियां, हमारी सरकार की कमियां और मौजूदा गवर्नर की हठधर्मिता-समान रूप से जिम्मेदार रही हैं। लेकिन जताया ऐसा जा रहा है, मानो केंद्रीय बैंक के कारण हमारी अर्थव्यवस्था की यह दुर्दशा हुई है। वस्तुतः अर्थव्यवस्था के संचालन में केंद्रीय बैंक की भूमिका मौद्रिक नीतियों तक ही सीमित है। ऐसे में नए गवर्नर कितने भी होनहार क्यों न हों, मौद्रिक नीतियों में कमोबेश बदलाव के अलावा उनके पास करने को ज्यादा कुछ होगा नहीं।

फिर रघुराम राजन तो वैसे भी रिजर्व बैंक द्वारा पीर, बावर्ची, भिश्ती, खर की भूमिकाएं निभाने के पक्षपाती नहीं हैं। केंद्रीय बैंक के बारे में उनकी सोच एकदम साफ है कि उसे अपना ध्यान सिर्फ मुद्रास्फीति कम करने पर केंद्रित रखना चाहिए। आईएमएफ के मुख्य अर्थशास्त्री के तौर पर उनके इस विचार को तब एकाधिक देशों ने खारिज कर दिया था। मंदी के दौरान अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा प्रोत्साहन पैकेज देने के फैसले की भी उन्होंने आलोचना की थी।
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कुल मिलाकर, वह रिजर्व बैंक द्वारा पारंपरिक भूमिका निभाने के ही पक्षपाती हैं; सुब्बा राव भी कमोबेश इसी पथ के पथिक हैं। मुख्यतः वित्तीय मामलों के विशेषज्ञ होने के कारण रघुराम राजन से वैसे भी अलग-अलग भूमिकाओं के निर्वहन की उम्मीद नहीं कर सकते। तथ्य यह भी है कि यूरोपीय और अमेरिकी अर्थव्यवस्था के इस विशेषज्ञ का भारतीय अर्थव्यवस्था पर कायदे का कोई काम भी नहीं है। हां, रिजर्व बैंक में विकेंद्रीकरण की पहल करते हुए वह एक मौद्रिक नीति कमेटी का गठन कर सकते हैं, जिसे सरकार भी खुशी-खुशी स्वीकार करेगी।

लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि हाल के वर्षों में वित्त मंत्रालय द्वारा रिजर्व बैंक पर हावी होने की जो प्रवृत्ति देखी गई है, उसमें आजाद ख्याल रघुराम राजन कितनी कुशलता से अपनी जिम्मेदारी निभा पाएंगे, यह देखना दिलचस्प होगा।
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