लोकसभा चुनाव में कांग्रेस समेत अनेक राजनीतिक पार्टियों के हाशिये पर चले जाने के बावजूद तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में भाजपा की लहर नहीं चली, तो इसकी एक वजह तो इन राज्यों की परंपरागत राजनीति ही है।
पर जब कांग्रेस चवालीस सीटों पर सिमट चुकी है, सपा, बसपा और वाम मोर्चा सबसे खराब दौर से गुजर रहे हैं, तब अन्नाद्रमुक, तृणमूल कांग्रेस और बीजद का प्रदर्शन बेहद प्रभावशाली रहा है, जिन्होंने कुल इक्यानबे सीटें जीती हैं। जिस तीसरे मोर्चे की बात की जा रही थी, कायदे से वह इन्हीं तीन दलों का गठजोड़ होता, बदलती राजनीतिक परिस्थिति के बीच जिसकी संभावना अब बहुत नहीं दिखती।
इनमें अन्नाद्रमुक 37 सीटें जीतकर तीसरी बड़ी पार्टी बनी है, तो इसका श्रेय जयललिता को जाता है, जिन्होंने खुद को तमिल हितों की संरक्षक बताते हुए आम आदमी के हित में कई कदम उठाए। उनमें अम्मा किचन और अम्मा पानी के अलावा भी महिलाओं व बच्चों के लिए कई योजनाएं थीं।
पश्चिम बंगाल में तृणमूल ने वाम मोर्चा और कांग्रेस को पहले ही हाशिये पर डाल दिया था, इस बार उसने मोदी की चुनौती का भी बखूबी सामना किया। बेशक दीदी भाजपा को पैर जमने देने से नहीं रोक पाई, पर उनकी पार्टी ने जितनी सीटें जीती हैं, उतनी इससे पहले वहां कोई दल अपने अकेले दम पर हासिल नहीं कर पाया था।
नवीन पटनायक की उपलब्धि इन सबसे बड़ी है, क्योंकि करीब चौदह वर्षों से सत्ता में होने के बावजूद उन्होंने लोकसभा और विधानसभा, दोनों में शानदार प्रदर्शन करते हुए सत्ता-विरोधी लहर को भी बेअसर किया और भाजपा के पक्ष में चली लहर को भी। लगातार चौथी बार शपथ लेने वाले वह ओडिशा के पहले मुख्यमंत्री भी हैं।
बीजद की दोहरी सफलता का कारण गरीबों और महिलाओं के हित में चलाई गई अनेक योजनाएं और भ्रष्टाचार के खिलाफ मुख्यमंत्री की सख्ती है। अपने विश्वस्त प्यारी मोहन महापात्र की बगावत का भी कोई असर नवीन पटनायक की लोकप्रियता पर नहीं पड़ा। इनमें से तृणमूल को छोड़ शेष दोनों दलों ने भले केंद्र की नई सरकार की नीतियों का विरोध करने का संकेत न दिया हो, पर इन्होंने यह तो जता ही दिया है कि जनता के हित में काम करने पर लहरों में डूबने की आशंका कम रहती है।