उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में हालात का इस तरह बिगड़ना जितना दुर्भाग्यपूर्ण है, उतना ही चिंताजनक यह है कि प्रशासनिक मोर्चे पर अब थोड़ी-सी भी गफलत नए इलाकों में हिंसक घटनाओं का कारण बन सकती है।
यह भीषण स्थिति एक दिन में नहीं बनी है। इसकी पृष्ठभूमि करीब एक पखवाड़ा पहले दो समुदायों के तीन युवाओं की हत्या से तैयार हो गई थी। उसके बाद एक समुदाय ने महापंचायत बुलाने का ऐलान किया था। उसे देखते हुए प्रशासन ने महापंचायत स्थल के आसपास तो सुरक्षा की तैयारी रखी, पर पूरे इलाके में सुरक्षा की मजबूत व्यवस्था नहीं की। उपद्रवियों ने इसका फायदा उठाते हुए पंचायत में जाते या वहां से लौटते लोगों को निशाना बनाया, जिससे बदले की आग और भड़क गई।
इसी तरह शुरुआत में हुई तीन हत्याओं के बाद खासकर उन प्रशासनिक अधिकारियों का तबादला भी दूरदर्शी कदम नहीं था, जो इलाके से बखूबी परिचित थे और जिनकी कोशिशों से पहले कई जटिल मामलों का समाधान हुआ था। यह साफ है कि स्थिति के बेकाबू होने से पहले तक प्रशासन ने मामले को बेहद हल्केपन से लिया। इसी का नतीजा है कि कर्फ्यू लगाने और शहर को सेना के हवाले करने के बावजूद हिंसा थमी नहीं है।
इस हिंसा से थोड़े दिनों पहले अलीगढ़ में भी सांप्रदायिक तनातनी की स्थिति थी। अलीगढ़ और मुजफ्फरनगर की घटनाएं सांप्रदायिक हिंसा की उन सिलसिलेवार घटनाओं से अलग हैं, जिनका सामना मुख्यमंत्री अखिलेश को सत्ता संभालने के तत्काल बाद करना पड़ा था। युवा मुख्यमंत्री को सत्ता संभाले लगभग डेढ़ साल हुए हैं, और इस छोटी अवधि में इस तरह की इतनी घटनाएं हुई हैं कि दो ही निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं-या तो प्रशासन-व्यवस्था ऐसी हिंसा पर अंकुश लगाने में विफल है या सुनियोजित ढंग से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की जमीन तैयार की जा रही है। अब सरकार कह रही है कि दोषी बख्शे नहीं जाएंगे।
लेकिन इस तरह की स्थिति आने ही क्यों दी जाती है? क्या उम्मीद करें कि देर से ही सही, सरकार मुजफ्फरनगर की आग बुझाएगी, और यह ध्यान रखेगी कि इस घटना की पुनरावृत्ति न हो! फिलहाल जरूरी यह भी है कि इस हिंसा पर राजनीति करने से सियासी दल परहेज करें।