यह त्रासद सच्चाई है कि अपनी सांस्कृतिक बहुलता और सहिष्णुता के जरिये दुनिया भर में विशिष्ट पहचान बनाने वाले इस देश में अभिव्यक्ति का खतरा निरंतर बढ़ता जा रहा है। अभिनेता-निर्देशक कमल हासन की फिल्म विश्वरूपम को लेकर उठा विवाद इसी ओर इशारा कर रहा है। यह हमारे समय का सबसे बड़ा सांस्कृतिक संकट है कि कुछ निहित स्वार्थों या राजनीतिक तुष्टीकरण के लिए चीजों को संदर्भों से काटकर देखा जा रहा है, या फिर उसे अपनी सुविधा से परिभाषित किया जा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय आंतकवाद पर केंद्रित विश्वरूपम को एक पूरे समुदाय की भावनाओं से जोड़ने के पीछे दरअसल ऐसी ही राजनीति है। समाजशास्त्री आशीष नंदी के दशकों के अध्ययन और विश्लेषण को चुनौती देकर उन्हें दलित-आदिवासी विरोधी करार देने की कोशिश या फिर चार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार विजेता कमल हासन की रचनाधर्मिता को ताक पर रखकर उनकी प्रतिबद्धता को संदेह के दायरे में रखना, एक समाज के रूप में हमारी गिरावट को ही रेखांकित करते हैं।
चिंता की बात यह है कि विचारों और समझ का दायरा लगातार संकुचित होता जा रहा है, नतीजतन कमल हासन जैसे संवेदनशील फिल्मकार को क्षुब्ध होकर देश से बाहर जाने की बात कहनी पड़ रही है! आखिर ऐसी ही कट्टरपंथी ताकतों के कारण मकबूल फिदा हुसैन को देश से बाहर जाना पड़ा था।
विश्वरूपम पर चूंकि मद्रास हाई कोर्ट ने अभी रोक लगा रखी है, इसलिए उसकी सामग्री पर बात करना ठीक नहीं, पर इस प्रकरण से केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के औचित्य पर सवाल उठता है। इस बोर्ड ने फिल्म को न केवल मंजूरी दी है, बल्कि इसकी अध्यक्ष लीला सैमसन ने तमिलनाडु सरकार की नीयत पर सवाल उठाया है।
यदि इसी तरह फिल्मों या किताबों पर सरकारें राजनीतिक आधार पर फैसले लेने लगीं, तब तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब ही नहीं रह जाएगा। ऐसी मानसिकता का शिकार हुए प्रसिद्ध लेखक सलमान रश्दी ने ठीक ही कहा है कि भारत को खुद से यह सवाल करने की जरूरत है कि आखिर वह सांस्कृतिक रूप से ऐसा असहिष्णु राष्ट्र क्यों बनता जा रहा है, जहां किताबों और फिल्मों पर प्रतिबंध लगाया जाता है।