यह अभी साफ नहीं है कि बोस्टन मैराथन में हुए हमले को किसने अंजाम दिया है, लेकिन अमेरिका में ठीक पैट्रियट्स-डे के दिन दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित आयोजनों में से एक को निशाना बनाकर कमोबेश वैसा ही संदेश देने की कोशिश की गई है, जैसा बारह साल पहले वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की दो मीनारों को ध्वस्त करके दिया गया था।
बेशक इन दोनों हमलों की भीषणता और हताहतों की संख्या में जमीन-आसमान का अंतर है। शायद इसी कारण अमेरिकी खुफिया एजेंसी इस हमले को आतंकवादी हमला मानने की जल्दबाजी में भी नहीं है।
इसके बावजूद वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और बोस्टन मैराथन में हुए हमलों की प्रतीकात्मकता देखने लायक है।
मसलन, पिछला हमला अमेरिका की आर्थिक ताकत को ध्वस्त करने की मंशा से किया गया था, तो इस हमले के पीछे उस अमेरिकी राष्ट्रवाद को निशाना बनाने का मंसूबा दिखता है, जो पैट्रियट्स-डे को न सिर्फ अंग्रेजों के खिलाफ अपनी पहली लड़ाई की स्मृति के तौर पर मनाता है, बल्कि हर विपत्ति के समय तनकर खड़े होने का माद्दा भी रखता है।
लिहाजा यह हो सकता है कि इन हमलों को अमेरिका के भीतर के ही किसी सिरफिरे राष्ट्रद्रोही समूह ने अंजाम दिया हो, जिसकी आशंका पैट्रियट्स-डे के दौरान रहती है।
इस तरह से देखें, तो इस हमले से अमेरिकी सुरक्षा व्यवस्था की पोल तो खुली ही है। 9/11 के बाद उसने अपनी सुरक्षा व्यवस्था को अचूक बनाने की हरसंभव कोशिश की, लेकिन यह हमला एक बार फिर बता गया है कि दुनिया की कोई भी जगह पूरी तरह सुरक्षित नहीं है।
फिर दो विस्फोटों से उपजी त्रासदी पर अमेरिका की क्षुब्ध प्रतिक्रिया भी बहुतेरे लोगों के लिए स्वाभाविक तौर पर आश्चर्यजनक है; आखिर उसी दिन इराक में बीस अलग-अलग हमलों में सैंतीस लोग मारे गए और उसके अगले दिन भूकंप में ईरान में कम से कम सौ लोगों की जान गई है!
इसके बावजूद बोस्टन में हुए हमलों के तुरंत बाद अमेरिकी प्रशासन की सख्ती और चौकसी भारत जैसे मुल्कों के लिए सबक की तरह तो हैं ही।
अमेरिका किसी भी हमले को बड़ी चुनौती के रूप में लेता है। जबकि एक हम हैं कि आतंकवाद के निशाने पर होने के बावजूद न तो वैसी प्रतिबद्धता दिखा पाते हैं, न ही वैसी तैयारी।