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दिल्ली की असुरक्षित बेटियां

Sun, 18 Oct 2015 07:20 PM IST
नई दिल्ली
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देश की राजधानी में एक ही दिन दो बच्चियों के साथ सामूहिक बलात्कार की घटनाएं बताती हैं कि निर्भया गैंगरेप जैसी हिला देने वाली त्रासदी भी न समाज को बदल पाई है, न ही सत्ता बदलने से प्रशासन-व्यवस्था में कोई सुखद बदलाव आया है। नवरात्रि के इन दिनों में हम मां दुर्गा की आराधना करने के साथ कन्याओं का भी पूजन करते हैं। लेकिन जिस तरह से इन दो बच्चियों के साथ बलात्कार हुआ, वह हमारी आस्थाओं की धज्जियां उड़ाता है। जो समाज छोटी बच्चियों को पूजता है, उसमें फूल-से बचपन को रौंदने वाले दरिंदे भी रहते हैं, इससे बड़ी विडंबना भला और क्या हो सकती है!
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लेकिन ये घटनाएं इससे भी अधिक प्रशासन-व्यवस्था की नाकामी के सुबूत हैं। पिछले ही दिनों पश्चिमी दिल्ली के केशवपुरम में चार साल की एक बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ था। अब फिर पश्चिमी दिल्ली के निहाल विहार में ढाई साल की और आनंद विहार में पांच साल की बच्चियों को शिकार बनाया गया। दुर्योग से ये दोनों बच्चियां समाज के कमजोर वर्ग से हैं, लेकिन इसी दिल्ली में पढ़ी-लिखी और कामकाजी महिलाओं को भी दरिदों का शिकार बनते देखा गया है।

निर्भया कांड के समय दिल्ली की शीला दीक्षित सरकार को कोसने वालों में आप और भाजपा मुखर थीं। लेकिन दिल्ली की सत्ता में आने के बाद आप न सिर्फ ऐसी घटनाओं को रोक नहीं पाई है, बल्कि ऐसी हर घटना पर वह जिस तरह केंद्र की भाजपा सरकार और लेफ्टिनेंट गवर्नर को कोसती है, वह क्षुब्ध ही ज्यादा करती है। निहाल विहार में जिस जगह से दरिंदे ढाई साल की बच्ची को अंधेरे का फायदा उठाकर ले गए, वहां स्ट्रीट लाइट खराब थी। इसके लिए कौन जिम्मेदार है?
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दूसरी तरफ केंद्र सरकार को भी ऐसे मामलों में चिंतित होना चाहिए, तो केवल इसलिए नहीं कि दिल्ली की पुलिस व्यवस्था उसके पास है, बल्कि इसलिए भी कि उसने स्मार्ट सिटी की जो पहल की है, उसमें दिल्ली भी है। स्मार्ट शहर सिर्फ गगनचुंबी इमारतों और चमचमाती सड़कों से नहीं बनते, बल्कि चुस्त प्रशासन-व्यवस्था, नागरिक सुरक्षा और लोगों की सोच से भी बनते हैं। जब देश की राजधानी में बच्चियां सुरक्षित नहीं हैं, तो दिल्ली से दूर देश के दुर्गम और दूरस्थ इलाकों में उनकी असहायता की सहज ही कल्पना की जा सकती है।
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