अपने जापान दौरे में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आपसी रिश्ता मजबूत करने के लिए जो सूत्र बताए हैं, वे बहुत महत्वपूर्ण हैं। जापान के साथ हमारे संबंध वस्तुतः कभी बहुत बुरे नहीं रहे। पोकरण-2 के बाद दोपक्षीय संबंधों में थोड़ी बहुत खटास जरूर आई थी।
परमाणु मुद्दे पर भी हमारे मतभेद रहे हैं। पर शिंजो अबे के दौर में जापान यह नजरिया त्यागने को भी तैयार दिखता है। पिछले कुछ वर्षों में ऑटोमोबाइल और दूसरे क्षेत्रों में अपने यहां जापान का भारी-भरकम निवेश और मेट्रो परियोजनाओं में उसकी मदद आपसी रिश्तों के बारे में बहुत कुछ कह जाती है। लेकिन भारत और जापान के मजबूत होते रिश्ते को चीन के चश्मे से देखने का कोई औचित्य नहीं है।
इससे इनकार नहीं कि चीन की मौजूदा वर्चस्ववादी नीति के कारण ली केचियांग की भारत यात्रा के तत्काल बाद हमारे प्रधानमंत्री के जापान दौरे को अर्थपूर्ण ढंग से देखा जा रहा है। खुद मनमोहन सिंह ने इस दौरे की अवधि बढ़ाकर और टोक्यो के साथ प्रतिरक्षा और सुरक्षा सहयोग करने का आशय जताकर भी बहुत कुछ जताने की कोशिश की है।
पर जापान के साथ रिश्तों में बढ़ती गर्मजोशी चीन की कीमत पर क्यों हो! यह ठीक है कि चीन के साथ हमारी दोस्ती कभी संदेह से परे नहीं रही, पर वह जापान और चीन के आपसी रिश्तों की तरह भी नहीं रही। यह देखने की बात है कि पीपुल्स डेली ने भारत और जापान की नजदीकी पर जो भड़ास निकाली है, उसमें बीजिंग के निशाने पर टोक्यो है, नई दिल्ली नहीं।
चीन का जापान के साथ जो कारोबार है, वह भारत के साथ व्यापार की तुलना में छह गुना है, इसके बावजूद चीन अगर हमारे साथ अपने रिश्तों में ज्यादा फूंक-फूंककर चलना चाह रहा है, तो इसका हमारे लिए रणनीतिक महत्व है। चूंकि इस मोड़ पर जापान भी हमारे साथ कारोबार बढ़ाने को इच्छुक है, इसलिए इन्फ्रास्ट्रक्चर से लेकर दूसरे कई मुद्दों पर जापानी उद्यमियों को आश्वस्त करके हमारे प्रधानमंत्री ने ठीक किया है।
जापान के साथ रक्षा संबंध बढ़ाने और समुद्री सुरक्षा की दिशा में आगे बढ़ने का भी दोनों को लाभ मिलेगा। यह नहीं भूलना चाहिए कि जापान के साथ संबंधों में आगे बढ़कर ही हम चीन पर कमोबेश दबाव बना सकते हैं, जो अन्यथा शायद संभव न हो।