गठबंधन सरकारों की अनिवार्यता ने राष्ट्रीय राजनीति को बहुत बदला हो या नहीं, इससे हमारी विदेश नीति पर खतरनाक असर पड़ रहा है। हालत यह है कि कभी कोई ममता बनर्जी, कभी कोई करुणानिधि, तो कभी कोई जयललिता अपना राजनीतिक हित-अहित देखते हुए विदेश नीति की दिशा तय करने लगती हैं।
ताजा मामला तमिलनाडु का है, जहां की मुख्यमंत्री ने आईपीएल के चेन्नई में होने वाले मैचों में श्रीलंकाई क्रिकेटरों और अधिकारियों को न आने देने का फरमान जारी किया, जिसे बीसीसीआई ने मान भी लिया! यह न सिर्फ भयादोहन की राजनीति के आगे आत्मसमर्पण है, यह न केवल खेल में राजनीति का दुखद घालमेल है, बल्कि आईपीएल के उस स्वरूप के साथ भी भद्दा मजाक है, जिसमें किसी भी देश के क्रिकेटर अपनी जगह बनाने के लिए स्वतंत्र हैं। लेकिन इससे भी खतरनाक तमिलनाडु विधानसभा द्वारा पारित वह प्रस्ताव है, जिसमें श्रीलंका सरकार को दोस्त देश न मानने, उस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने और वहां स्वतंत्र तमिल ईलम के लिए संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में एक जनमत सर्वेक्षण कराए जाने की मांगें शामिल हैं।
ये जो तीन मुद्दे हैं, इन पर विचार केंद्र सरकार को करना है, राज्य सरकार को नहीं। फिर तमिलनाडु विधानसभा इस तरह का प्रस्ताव कैसे पारित कर सकती है? यह प्रस्ताव इस अर्थ में बहुत खतरनाक है कि इसमें जातीयता के आधार पर एक देश को तोड़ने की वकालत की गई है। अव्वल तो लोकतांत्रिक मूल्यों का पालन करने वाला कोई भी देश अपने पड़ोसी मुल्क को अस्थिर करने की सोच नहीं सकता। इस प्रस्ताव के समर्थक यह भूल गए कि वैसी स्थिति में कश्मीर को अस्थिर करने की अंतरराष्ट्रीय कोशिशों को भी बल मिल सकता है। फिर इससे श्रीलंका में तमिलों की समस्या के समाधान की गारंटी क्या है?
यह नहीं भूलना चाहिए कि श्रीलंका में हस्तक्षेप कर अतीत में हम अपना एक प्रधानमंत्री खो चुके हैं। जब वैसे भी हमारी विदेश नीति सबसे दयनीय दौर में है, तब श्रीलंका को अपना शत्रु बनाने से बेहतर है कि हम वहां की सरकार को भरोसे में लेकर उससे तमिलों की बेहतरी के लिए कदम उठाने को कहें। यह अच्छा है कि हमारी सरकार न पहले द्रमुक के दबाव में आई, और न अब वह तमिलनाडु विधानसभा में पारित प्रस्ताव के पक्ष में है। सख्ती के साथ यह बताने का समय आ गया है कि विदेश नीति क्षेत्रीय पार्टियों के हित-अहित के आधार पर तय नहीं हो सकती।