राजधानी दिल्ली की चर्चित बटला हाउस मुठभेड़ को सही और एकमात्र दबोचे गए शख्स शहजाद अहमद को दोषी ठहराने के निचली अदालत के फैसले के बाद कायदे से इस अध्याय को यहीं समाप्त हो जाना चाहिए।
उसकी वजह यह है कि सत्र न्यायालय से पहले मानवाधिकार आयोग ने भी साफ कर दिया था कि वह मुठभेड़ फर्जी नहीं थी। यह अलग बात है कि उस मुठभेड़ से उठे कुछ सवालों के जवाब अब भी नहीं मिले हैं। सिर्फ यही नहीं कि मुठभेड़ के लिए पहुंचे पुलिस बल की तैयारी फूलप्रूफ नहीं थी, बल्कि पुलिस इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा की मौत और कुछ आतंकियों के निकल भागने के बारे में सुबूत भी पुख्ता नहीं थे।
आसपास के लोगों, पीड़ित परिवारों और जामिया मिल्लिया टीचर्स एसोसिएशन की प्रतिक्रियाओं की भी अनदेखी नहीं कर सकते। लेकिन ऐसे मामलों में अदालती फैसले के बाद भी कई सवाल अनुत्तरित रह जाते हैं। इसके बावजूद जो लोग इस फैसले से इत्तफाक नहीं रखते, उनके लिए ऊपरी अदालत में जाने का विकल्प खुला है।
वस्तुतः आतंकवाद का खतरा जितना भीषण है, उसमें इस एनकाउंटर पर दो-दो निष्कर्षों के बाद संदेह की गुंजाइश कम ही रह जाती है। मानने का कारण है कि आजमगढ़ से पढ़ाई करने आए युवाओं में से कुछ ने आतंक की तालीम लेने के बाद दिल्ली में सिलसिलेवार बम धमाकों को अंजाम दिया हो, फिर शिकंजे में आ गए हों।
अलबत्ता इस मामले में जिस किस्म की राजनीति हुई, वह ज्यादा खतरनाक है। एनकाउंटर के चार वर्ष बाद उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के समय दिग्विजय सिंह और सलमान खुर्शीद जैसे वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं ने उस मुठभेड़ पर सवाल खड़े किए। अल्पसंख्यक वोटों की राजनीति करते हुए वे न सिर्फ आतंकवाद के खतरे की अनदेखी कर रहे थे, बल्कि ऐसे में अपनी ही सरकार की विपरीत दिशा में खड़े थे।
उस मुठभेड़ को पुलिस ने अंजाम दिया था, उसकी सत्यता जांचना अदालत का काम था; इसमें राजनीतिक दखलंदाजी और टीका-टिप्पणियों का तो कोई औचित्य ही नहीं था। लेकिन अदालती फैसले के बाद भी दिग्विजय सिंह अपने रुख पर जिस तरह अड़े हुए हैं, उसे देखते हुए कौन यकीन करेगा कि आतंकवाद पर राजनीति बंद हो जाएगी!