अफगानिस्तान के भविष्य को लेकर जिस तेजी से घटनाक्रम बदल रहे हैं, उसमें भारत को चौकस रहने की जरूरत है, लेकिन यह देखना भी जरूरी है कि इसका दबाव विदेश नीति पर न पड़े।
मगर ब्रुनेई में आसियान के क्षेत्रीय सम्मेलन में विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने अफगानिस्तान की शांति प्रक्रिया में अफगान समाज के विभिन्न तबकों के साथ ही तालिबान और अन्य सशस्त्र अलगाववादी गुटों को भी शामिल किए जाने का समर्थन किया है। उनका यह बयान तालिबान के बारे में भारत के अब तक के रुख से अलग लगता है, क्योंकि उसने तालिबान को कभी मान्यता नहीं दी।
दोहा में तालिबान का कार्यालय खोले जाने और अमेरिका के साथ उसकी प्रस्तावित बातचीत की बात सामने आने के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा था कि अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया वहां के संविधान और अफगान संप्रभुता का सम्मान करके ही आगे बढ़ सकती है। भारत तालिबान के साथ बातचीत किए जाने के खिलाफ रहा है और अमेरिका की तरह उसने अच्छे या बुरे तालिबान जैसा कोई भेद भी नहीं किया है।
उसका साफ मानना रहा है कि अफगानिस्तान की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य निर्वाचित सरकार और वहां के अलगाववादी गुटों को एक पलड़े पर नहीं रखा जा सकता। फिर यह भी देखना चाहिए कि अमेरिका ने बातचीत के लिए जो शर्तें रखी हैं, उसके बारे में तालिबान का रुख अभी तक स्पष्ट नहीं है।
ये शर्तें हैं, बातचीत अफगानिस्तान के संविधान के दायरे में होगी, तालिबान को हिंसा और अल कायदा का साथ छोड़ना होगा, महिलाओं और जातीय अल्पसंख्यकों के अधिकारों के प्रति प्रतिबद्धता जतानी होगी और अफगानिस्तान की संप्रभुता को अक्षुण्ण रखना होगा।
सवाल सिर्फ हिंसा का नहीं है, तालिबान एक व्यवस्था है,जिसकी ज्यादतियां दुनिया ने 1996 से 2001 के दौरान उसके अफगानिस्तान में किए गए शासन में देखी है। वास्तव में तालिबान को खाद-पानी पड़ोसी पाकिस्तान से मिलता रहा है, इसलिए यह जोखिम बराबर बना हुआ है कि अमेरिका और नाटो की वापसी के बाद वहां वही ताकतें दोबारा नियंत्रण तो नहीं कर लेंगी, जिनकी वजह से क्षेत्रीय शांति को खतरा पैदा हो गया।
अफगानिस्तान के भविष्य में निश्चय ही भारत की महत्वपूर्ण भूमिका है, लेकिन यह ध्यान रखने की जरूरत है कि तालिबान को किसी भी रूप में मान्यता देने से कल को भारत के अंदरूनी मामलों में भी यही सवाल सामने खड़ा हो सकता है।