अरविंद केजरीवाल ने प्राकृतिक गैस की कीमत बढ़ाने के मुद्दे पर केंद्र सरकार पर जो हमला बोला है, वह नया नहीं है। केंद्र ने इसकी कीमत अप्रैल, 2014 से बढ़ाकर आठ डॉलर प्रति यूनिट करने का फैसला जिस तरह विगत जून में ही ले लिया था, उस पर तभी सवाल उठे थे।
एक प्रश्न तो यही था कि जब लोकसभा चुनाव के बाद केंद्र में नई सरकार गठित होनी है, तब यूपीए सरकार ऐसा कोई फैसला कैसे कर सकती है। वह निर्णय इसलिए भी संदिग्ध था कि कीमत में बढ़ोतरी का लाभ सिर्फ रिलायंस इंडस्ट्रीज को मिलना है, जिसके प्रति केंद्र की नरमी के संकेत पहले भी मिले हैं। केजी बेसिन में इस कंपनी की ऑडिट के मामले में केंद्र के ढुलमुल रवैये की खिंचाई कैग ने जिस तरह की थी, उसे कौन भूल सकता है? इसलिए अरविंद केजरीवाल के हमले पर वीरप्पा मोइली को सफाई देने के बजाय पूरे तथ्यों के साथ सामने आना चाहिए।
बेशक प्राकृतिक गैस की खोज एक जटिल प्रक्रिया है और इसमें पर्याप्त निवेश भी जरूरी है, पर बाजार को इसकी कीमत तय करने देने के बजाय खुद सरकार ने जिस तरह इसके भावी मूल्य तय कर दिए, वह उस आर्थिक उदारीकरण के सिद्धांत के खिलाफ भी है, जिसका दम भरते हुए यह सरकार नहीं थकती। इसी दौर में अमेरिका में शेल गैस की कीमत घटने का उदाहरण भी हमारे सामने है, जो इसलिए संभव हुआ कि सरकार ने निवेश में वृद्धि कर प्रतिद्वंद्विता को बढ़ावा दिया।
एक नागरिक, और मुख्यमंत्री के तौर पर भी, केजरीवाल यह मामला उठाने के लिए स्वतंत्र हैं। पर केंद्रीय मंत्री, सांसद, नौकरशाह और रिलायंस इंडस्ट्रीज के मुखिया के खिलाफ भ्रष्टाचार-निरोधक शाखा को एफआईआर दर्ज करने का निर्देश एक मुख्यमंत्री दे, यह मान्य तौर-तरीके के विपरीत और सनसनी व लोकप्रियता हासिल करने का इरादा ही ज्यादा लगता है।
सवाल यह है कि क्या दिल्ली सरकार को इस मामले की जांच का अधिकार है। प्रश्न यह भी कि क्या भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो केंद्रीय मंत्रियों और सांसदों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर सकता है। इस मामले में प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर चिंता जताना ही काफी था। अपनी सरकार के कामकाज की फिक्र छोड़ केंद्र सरकार पर हमले का इकलौता एजेंडा केजरीवाल और उनकी टीम का नुकसान ही ज्यादा करेगा।