आप यानी आम आदमी पार्टी की विदेशी फंडिंग की जांच शुरू करवाने की बात कहकर गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने एक ऐसी बहस छेड़ दी है, जिससे सरकार की ही किरकिरी हो रही है! मसलन, यह धारणा बनी है कि दिल्ली में आप की लोकप्रियता से आशंकित कांग्रेस ने उसे घेरने का दांव चला है। इसमें शक नहीं कि विदेशी चंदे के साथ कई आशंकाएं जुड़ी होती हैं। लेकिन जांच सिर्फ आप की विदेशी फंडिंग की ही क्यों? उस पर सवाल उठाते हुए कांग्रेस और भाजपा खुद सवालों के घेरे में आ गई हैं।
आप को मिल रहे विदेशी चंदे की बेशक जांच हो, पर तमाम राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले धन के स्रोतों की जांच भी साथ-साथ क्यों न हो? सवाल यह है कि परिदृश्य पर पहले से मौजूद पार्टियां जब चंदे के मामले में पारदर्शी नहीं हैं, तब वे एक नई पार्टी से पारदर्शिता की उम्मीद कैसे कर रही हैं। गृह मंत्री ने बाद में सफाई दी कि आप के खिलाफ जांच सरकार ने अपने आप नहीं शुरू की, बल्कि दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्देश के बाद प्रारंभ की है, जिसने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र को यह निर्देश दिया। लेकिन इसी यूपीए सरकार को थोड़े दिनों पहले चुनाव सुधार से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले के खिलाफ अध्यादेश लाते इस देश ने देखा है; राहुल गांधी ने पहल न की होती, तो उसे वापस हरगिज नहीं लिया जाता। इसी सरकार को आरटीआई के दायरे में आने के केंद्रीय सूचना आयोग के फैसले के खिलाफ दूसरे दलों के साथ एकजुट होते हमने देखा है। इसलिए यह कहने का तो उसे कोई नैतिक अधिकार ही नहीं है कि वह अदालती दिशा-निर्देशों का पालन करती है।
फिर आप के खिलाफ जनहित याचिका की बात कहते हुए उसने जान-बूझकर यह तथ्य छिपा लिया कि दिल्ली उच्च न्यायालय में ही एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स ने कांग्रेस और भाजपा के खिलाफ एक याचिका दायर कर रखी है, जिसमें न सिर्फ इनकी विदेशी फंडिंग की बात कही गई है, बल्कि यह भी कि इन दोनों पार्टियों को करीब पचहत्तर फीसदी दान अज्ञात स्रोतों से मिलता है। जाहिर है, जब तक चंदे के बारे में तमाम दल पारदर्शिता नहीं दिखाएंगे, तब तक एक पार्टी के खिलाफ शुरू जांच राजनीतिक कार्रवाई ही कहलाएगी।