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चुनौतियां कम नहीं हैं

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असमंजस से उबरकर राजनाथ सिंह को भाजपा ने अपना नया अध्यक्ष जरूर चुन लिया है, लेकिन नितिन गडकरी की जगह उनकी नियुक्ति को लेकर पर्दे के पीछे चले तेज घटनाक्रम से समझा जा सकता है कि परिवार में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है। संघ और भाजपा अपने रिश्ते को चाहे जिस तरह से भी परिभाषित करें, मगर गडकरी को लेकर दोनों में जिस तरह से टकराव की स्थिति बन गई थी, उससे भाजपा को नुकसान हो सकता था।
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पार्टी के लिए यह जरूरी हो गया था कि वह गडकरी से निजात पाए, क्योंकि उनकी वजह से भ्रष्टाचार के मुद्दे पर यूपीए और कांग्रेस के खिलाफ उसकी लड़ाई कमजोर नजर आ रही थी। गडकरी अब भले ही खुद को शहीद की तरह पेश करने की कोशिश करें, पर सार्वजनिक जीवन का पुराना कायदा है कि रानी को संदेह से परे होना चाहिए। इस तरह देखें, तो गडकरी को दूसरी पारी नहीं देना का फैसला पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए राहत देने वाला होगा।

उनकी जगह कमान संभालने वाले राजनाथ सिंह ने यूपीए की आर्थिक नीति से लेकर आतंकवाद जैसे मुद्दे पर काफी आक्रमकता दिखाई है और साफ कर दिया है कि वह आने वाले समय में और हमलावर हो सकते हैं। मगर उनकी मुश्किल यह है कि उन्हें विरासत में ऐसी पार्टी मिली है, जिसमें गुटबाजी और निजी महत्वाकांक्षाएं जोर मार रही हैं। लालकृष्ण आडवाणी जैसे वरिष्ठ नेता तक अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने को तत्पर हैं।
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झारखंड में पार्टी की अगुआई वाली गठबंधन सरकार गिर चुकी है और कर्नाटक में जगदीश शेट्टार की सरकार संकट में है। इसके अलावा पार्टी में प्रधानमंत्री पद के भावी उम्मीदवार को लेकर भी खींचतान तेज है। पार्टी को अंदरूनी संकट से उबारने के साथ ही उन्हें अगले कुछ महीने में होने वाले विधानसभा चुनावों की रणनीति तैयार करनी होगी। पर उनकी असली चुनौती 2014 के आम चुनावों को लेकर होगी, जिसके लिए उन्हें न केवल 80 सीटों वाले उत्तर प्रदेश में पार्टी का आधार मजबूत करना होगा, बल्कि सहयोगी दलों के साथ भी तालमेल बिठाना होगा। वाकई यह राजनाथ सिंह के लिए बड़ा अवसर है, जिनकी अगुआई में पिछले आम चुनाव में पार्टी की सीटें घट गई थीं।
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