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 नौकरशाही की मुक्ति का रास्ता

Thu, 31 Oct 2013 07:41 PM IST
नई दिल्ली
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इसी वर्ष मई में सीबीआई को राजनीतिक आकाओं के 'पिंजरे का तोता' बताने के बाद सर्वोच्च अदालत ने अब पूरी नौकरशाही को ही राजनीतिक दबावों से मुक्त करने की दिशा में एक ऐतिहासिक आदेश जारी किया है।
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असल में भारतीय शासन व्यवस्था में नौकरशाही की अहम भूमिका है, मगर जो व्यवस्था अपनाई गई, उसमें नौकरशाहों के लिए स्वतंत्र रूप से काम करने की गुंजाइश लगातार कम होती गई है। हालत यहां तक हो गई कि सरकारों के बदलने के साथ ही पूरा प्रशासनिक ढांचा ही उलट-पुलट जाता है।

अधिक दिन नहीं हुए, जब उत्तर प्रदेश में एक सरकार के जाने के बाद सबसे पहले इस्तीफा देने वाले कैबिनेट सचिव थे, जो राजनीतिक कारणों से ही वहां तक पहुंच सके थे! शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए जरूरी है कि नौकरशाही को बिना किसी दबाव के काम करने दिया जाए। सर्वोच्च अदालत ने प्रशासनिक कामकाज में बढ़ती राजनीतिक दखलंदाजी को संज्ञान में लिया है और व्यवस्था दी है कि अधिकारियों को अपने राजनीतिक आकाओं के मौखिक आदेश नहीं मानने चाहिए।
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मुजफ्फरनगर दंगों के समय यह बात सामने आई ही थी कि कैसे कथित तौर पर एक वरिष्ठ मंत्री के फोन पर दिए गए मौखिक आदेश पर वहां पक्षपातपूर्ण तरीके से कार्रवाई की गई थी। यह कोई विरला मामला नहीं है। आपातकाल के दौर में देखा गया था कि कैसे पूरी नौकरशाही सरकार की बंधुआ बनकर रह गई थी।

वैसे इस आदेश को हाल के दो मामलों के आलोक में देखने की जरूरत है। इसमें से पहला, हरियाणा से जुड़ा हुआ है, जहां दो दशक के करियर में चालीस तबादले झेल चुके वरिष्ठ आईएएस अधिकारी अशोक खेमका को राबर्ट वाड्रा और डीएलएफ के संदिग्ध जमीन सौदे को रद्द करने की कीमत चुकानी पड़ी। जबकि दूसरा मामला उत्तर प्रदेश का है, जहां युवा आईएएस दुर्गाशक्ति नागपाल को कथित तौर पर राजनीतिक कारणों से निलंबित कर दिया गया था।

इस आदेश का तत्काल असर यह होगा कि केंद्र और राज्य सरकारों को तीन महीने के भीतर नौकरशाहों की पदस्थापना, कार्यकाल आदि से संबंधित दिशा-निर्देश जारी करने होंगे। मगर लाख टके का सवाल है कि क्या राजनीतिक वर्ग इसे कानूनी जामा पहनाने को तैयार होगा?
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