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अफगानिस्तान में आगे का रास्ता

Thu, 20 Jun 2013 10:18 PM IST
नई दिल्ली
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अफगानिस्तान से अपनी वापसी की तैयारी कर रहे अमेरिका का तालिबान से सीधी बातचीत का फैसला अप्रत्याशित नहीं है, लेकिन इससे बहुत जल्दी कुछ निकल आएगा, ऐसा लगता नहीं है। इस कदम से उसकी मजबूरी ही झलक रही है, क्योंकि इस फैसले के जरिये उसने एक तरह से तालिबान को राजनीतिक मान्यता दे दी है!
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यह अचानक नहीं हुआ है, दरअसल अमेरिका विगत कई वर्षों से पिछले दरवाजे से तालिबान के साथ समझौते की बात तो करता ही रहा है। दोहा में मंगलवार को ही तालिबान ने न केवल अपना कार्यालय खोला है, बल्कि उसने यह जतलाने की कोशिश भी की है कि वही अफगानिस्तान का आधिकारिक प्रतिनिधि है।

अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई की नाराजगी के कारण अमेरिकी दबाव में भले ही तालिबान ने अपने कार्यालय से अफगान झंडा और बैनर हटा लिया है, लेकिन इससे स्थिति बहुत बदलने वाली नहीं है। तालिबान से बातचीत में कुछ बुराई नहीं है, लेकिन यह एक चुनी हुई सरकार को नजरंदाज कर नहीं होनी चाहिए।
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9/11 के हमले के बाद अमेरिका और नाटो सेनाओं के ताबड़तोड़ हमले ने अफगानिस्तान को इस कदर जर्जर कर दिया कि वह आज तक उबर नहीं पाया है। अफगानिस्तान के पुनर्निमाण के लिए जरूरी है कि वहां शांति प्रक्रिया में तेजी लाई जाए, मगर यह ध्यान रखा जाए कि नाटो और अमेरिकी फौजों की वापसी के बाद यह देश फिर उन्हीं हाथों में न चला जाए, जिन्होंने उसकी ऐसी हालत कर दी।

अमेरिका की वापसी के बाद पाकिस्तान तालिबान के साथ मिलकर अफगानिस्तान को परोक्ष रूप से नियंत्रित करने की कोशिश कर सकता है। इसलिए अफगानिस्तान के भविष्य से संबंधित हर फैसले में पाकिस्तान की भूमिका पर भी नजर रखने की जरूरत है। अफगानिस्तान से भारत के हित भी जुड़े हुए हैं, इसलिए वहां की शांति प्रक्रिया में उसकी बड़ी भूमिका हो सकती है।

इस क्षेत्र के साथ ही, यह अफगान लोगों के हित में है कि वहां लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम रहे। इस देश के लोगों ने तालिबान के शासन का मध्ययुगीन तौर-तरीका देखा है, जिसने नागरिक आजादी छीन ली थी। इसलिए वे भी नहीं चाहते कि वहां किसी भी रूप में कट्टरपंथियों की वापसी हो।
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