भाजपा के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने के बाद हरियाणा के रेवाड़ी में अपनी पहली जनसभा से नरेंद्र मोदी ने जो संदेश दिए हैं, वे उनकी पार्टी का मनोबल बढ़ाने वाले ही हैं।
ज्यादातर पूर्व फौजियों की इस रैली में उन्होंने सीमा पर चीन और पाकिस्तान की उकसावे वाली घटनाओं की तीखी आलोचना तो की ही, यूपीए की कमजोरी उजागर करते हुए सरकार बदलने की जरूरत भी जताई। जिस रैली की अध्यक्षता पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह कर रहे थे, उस रैली में सैनिकों के प्रति सरकार की कथित संवेदनहीनता की बात करते हुए मोदी ने न सिर्फ पूर्व फौजियों का समर्थन चाहा, बल्कि इसके जरिये वह उस हरियाणा में भाजपा के बेहतर प्रदर्शन का ख्वाब भी बुन रहे हैं, जहां यह पार्टी मजबूत स्थिति में कभी नहीं रही।
इससे पहले मोदी को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी बनाने के फैसले पर पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को, खासकर लालकृष्ण आडवाणी का जैसा विरोध झेलना पड़ा, उसने भाजपा की अंदरूनी कलह की एक बार फिर कलई ही खोली। यह ठीक है कि उम्र और समय अब लालकृष्ण आडवाणी के पक्ष में नहीं हैं, लेकिन इस तरह का कोई फैसला सर्वानुमति से ही होना चाहिए था। पर सच्चाई यह भी है कि यूपीए सरकार की अलोकप्रियता, भ्रष्टाचार, सीमा पर ढुलमुलपन आदि को भुनाने के लिए भाजपा के पास नरेंद्र मोदी से बेहतर कोई चेहरा फिलहाल नहीं है।
सिर्फ गांव-देहातों में नहीं, शहरों-महानगरों में भी उनकी लोकप्रियता बढ़ रही है, जिसका ताजा संकेत दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ के चुनाव में अध्यक्ष सहित तीन पदों पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कब्जे से भी कमोबेश मिलता है।
अलबत्ता राष्ट्रीय राजनीति में मोदी को अपनी क्षमता का सुबूत अभी देना है। अब न तो गुजराती अस्मिता का नारा ही उनके काम आएगा और न ही बार-बार यूपीए सरकार को निशाना बनाने से बात बनेगी। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर उनकी तुलना अटल बिहारी वाजपेयी से की जाएगी, जिनकी न सिर्फ अखिल भारतीय छवि रही है, बल्कि जो सबको साथ लेकर चलने में यकीन करते रहे हैं। मोदी की सफलता की गारंटी भी तभी होगी, जब वह पार्टी में सबको साथ लेकर चलने में विश्वास करेंगे।