भारत और पाकिस्तान के सैन्य अभियान के महानिदेशकों (डीजीएमओ) की पिछले 24 दिसंबर को हुई बैठक के बाद नियंत्रण रेखा पर संघर्ष विराम के उल्लंघन की घटना फिलहाल रुक गई है, लेकिन सीमा पार से घुसपैठ की कोशिशें अभी भी जारी हैं। ऐसे में थल सेना प्रमुख जनरल बिक्रम सिंह की सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (अफ्स्पा) की मौजूदगी के पक्ष में दी गई दलीलों से सहमत हुआ जा सकता है।
ऐसे मौके पर, जब कुछ महीने बाद अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजों की वापसी तय है, किसी भी तरह की ढिलाई से बड़ा नुकसान हो सकता है। दरअसल अफ-पाक क्षेत्र में घटनाक्रम तेजी से बदल रहे हैं, उसे देखते हुए सावधानी की जरूरत है। खुद पाकिस्तान तालिबान को लेकर जिस तरह से उलझा हुआ है और अफगानिस्तान के कथित उदारवादी तालिबान से बातचीत की विफल कोशिश अमेरिका कर चुका है। ऐसे में अनुमान लगाना मुश्किल है कि जब अफगानिस्तान पर से अमेरिका का दबाव कम होगा, तो उसका असर दक्षिण एशिया के इस हिस्से में किस तरह का होगा।
फिर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि तीन-चार महीने बाद हमारे देश में आम चुनाव भी होने हैं, जिन्हें निशाना बनाने की कोशिशें भी सीमा पार से हो सकती हैं। असल में अफ्स्पा की आड़ में मानवाधिकार हनन की जिस तरह से अनेक घटनाएं सामने आई हैं, उसमें इस कानून की मौजूदगी पर सवाल उठे हैं।
जम्मू और कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का भी कहना है कि जिन क्षेत्रों में स्थिति पहले से बेहतर हुई है, वहां से इस कानून के प्रावधान हटाए जाने चाहिए। वहां गाहे-बगाहे आम नागरिकों के मारे जाने की खबरें आती रही हैं और इसके बाद वहां की शांति-व्यवस्था बिगड़ती रही है। सेना की इस तरह की अपवाद स्वरूप कार्रवाइयां भी अलगाववादी ताकतों को मुद्दा देती रही हैं। खुद जनरल सिंह ने भी मार्च, 2000 की घटना का जिक्र करते हुए मानवाधिकार उल्लंघन की बात मानी है और आश्वस्त किया है कि जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
आम आदमी पार्टी के प्रशांत भूषण के अफ्स्पा पर दिए गए विवादास्पद बयान से इत्तफाक न रखते हुए यह कहा जा सकता है कि आम कश्मीरियों का विश्वास जीतकर ही हालात को और बेहतर बनाया जा सकता है।