दक्षिण सूडान का दुर्भाग्य देखिए कि स्वतंत्र देश होने के बाद भी वह कबीलाई खून-खराबे से मुक्त नहीं हो पाया है। पिछले करीब दस दिनों के दौरान दो कबीलों के बीच भड़की हिंसा में वहां हजारों लोग मारे गए हैं और लगभग एक लाख बेघर हैं, जिनमें से आधे लोगों ने संयुक्त राष्ट्र के शरणार्थी शिविरों में शरण ले रखी है।
विद्रोहियों के खिलाफ सरकार की कार्रवाई भी शत्रुतापूर्ण ही ज्यादा लगती है। ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिसमें सुरक्षा बलों ने विद्रोही न्यूर कबीले के बड़े समूहों को मौत के घाट उतार दिया है। संयुक्त राष्ट्र ने अब जाकर वहां शांति सैनिकों की संख्या दोगुनी की है, जबकि ज्यादातर ताकतवर देशों का इस मामले में उदासीन रवैया क्षुब्ध ही अधिक करता है।
आजाद होने के बाद दक्षिण सूडान में सरकार का गठन जिस रूप में हुआ, दरअसल वही बहुत आश्वस्त करने वाला नहीं था। बहुसंख्यक डिंका कबीले से जुड़े राष्ट्रपति सल्वा कीर ने जहां पार्टी अनुशासन की अनदेखी करते हुए शुरू से ही तानाशाही तौर-तरीका अपनाया, वहीं उपराष्ट्रपति पद से हटाए जाने के बाद न्यूर कबीले से संबद्ध रीक मेचर की महत्वाकांक्षा ने भी भीषण रूप से सिर उठाना प्रारंभ किया।
गौरतलब है कि करीब दो दशक तक चले गृहयुद्ध में भी मेचर की भूमिका रही थी। दक्षिण सूडान के पास अकूत तेल संपदा है; उसके राजस्व का करीब अट्ठानबे फीसदी हिस्सा तेल की बिक्री से प्राप्त होता है। इसके बावजूद चारों ओर पसरी भयावह गरीबी बताती है कि वहां योजनाबद्ध विकास की कोई रूपरेखा तक नहीं बनी। तिस पर उत्तर में एक कुटिल पड़ोसी के कारण जब-तब वहां हिंसा और खून-खराबे की आशंका बनी रहती है। यह आश्वस्तकारी है कि संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप के बाद अब इथियोपिया में दोनों कबीलों के बीच शांति वार्ता का माहौल बना है।
लेकिन यही काफी नहीं है, अंतरराष्ट्रीय समुदाय को उसके विकास के मामले में प्रतिबद्ध होना होगा। भारत कच्चा तेल आयात करने के बदले वहां आधारभूत संरचना के विकास, स्वास्थ्य, शिक्षा और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में निवेश करने का इच्छुक है। विकसित मुल्क अगर इस नवजात देश की बेहतरी के लिए एक रोडमैप के साथ आगे आएं, तो स्थिति बदलते देर नहीं लगेगी।